मुनाफे के लिए मिर्च की खेती – शिमला मिर्च और मिर्च की खेती

How to grow Pepper for profit

खेतों में व्यावसायिक रूप से शिमला मिर्च और मिर्च की खेती कैसे करें

मिर्च की खेती आय का अच्छा स्रोत हो सकती है। संक्षेप में, मिर्च एक बारहमासी पौधा है, लेकिन ज्यादातर किसान इसे वार्षिक पौधे के रूप में उगाते हैं। ज्यादातर शिमला मिर्च और मिर्च उगाने वाले किसान आंतरिक संरक्षित परिवेश में बीजों (संकर) से फसल की शुरुआत करते हैं। छोटे पौधों के बढ़ने और रोपाई के लिए तैयार होने का इंतज़ार करते हुए, वो अपने खेत तैयार करते हैं। वो खेत की जुताई करके पिछली फसल के अवशेषों को निकाल देते हैं, और उन सभी पंक्तियों पर प्लास्टिक की चादर बिछा देते हैं, जहाँ उन्हें अपने पौधों की रोपाई करनी है। यह प्लास्टिक की चादर न केवल मिट्टी को ज्यादा गर्म रखने में मदद करती है, बल्कि खरपतवार नियंत्रित करने में भी उपयोगी है। इसके अलावा, किसान ड्रिप सिंचाई प्रणाली भी डिज़ाइन और सेट कर देते हैं। रोपाई के लिए तैयार होने पर, वो प्लास्टिक की चादर में छोटे-छोटे छेद करके, वहां पौधों को रोप देते हैं। ज्यादातर मामलों में उर्वरीकरण, ड्रिप सिंचाई और खरपतवार प्रबंधन का प्रयोग किया जाता है। कई किसान पौधे के विकास में मदद करने के लिए, वायु संचार बेहतर बनाने के लिए, और कुछ हफ्ते बाद फसल आसानी से काटने के लिए पौधों को सहारा देते हैं। हालाँकि, सभी मिर्च के पौधों को सहारा देने की ज़रूरत नहीं पड़ती। मिर्च की अधिकांश किस्मों को रोपाई के 60-90 दिन बाद काटा जा सकता है। रोपाई से कटाई तक का समय मिर्च की किस्म, जलवायु परिस्थितियों और रोपे गए पौधों की आयु पर निर्भर करता है। किसान, आमतौर पर, हर हफ्ते 1-2 सत्रों में कैंची या चाकू से मिर्च की कटाई करते हैं। खेतों में मिर्च उगाने वाले किसान कटाई के लिए ट्रैक्टरों का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। कटाई के बाद, वे जुताई करके फसल के अवशेषों को नष्ट कर देते हैं। बीमारियों को नियंत्रित करने और मिट्टी के क्षय को रोकने के लिए, वे फसल चक्रीकरण (पत्तागोभी, मक्का, फलियां और अन्य से) का प्रयोग भी कर सकते हैं।

खेत में मिर्च उगाते समय एकमात्र प्रतिबंधात्मक कारक तापमान होता है। इस पौधे को औसतन 18-26 °C (64.4-78.8 °F) तापमान की ज़रूरत होती है। पराग उत्पन्न करने के लिए पौधे के लिए दिन का तापमान 23 °C (73.4 °F) और रात का तापमान 18 °C (64.4 °F) के करीब होना ज़रूरी है। मिट्टी का तापमान 18 °C (64.4 °F) से नीचे नहीं जाना चाहिए। विकास अवधि के दौरान कम तापमान की वजह से पौधे का विकास रुक जायेगा। ऐसे पौधों के लिए दोबारा रिकवर कर पाना लगभग नामुमकिन हो सकता है।

अपने क्षेत्र में उगने वाली मिर्च की किस्मों के चुनाव के साथ-साथ उगाने की विधि तय करना भी महत्वपूर्ण है। मिर्च उगाने की दो विधियां हैं: बीज से उगाना या पौधों से उगाना।

बीज से मिर्च कैसे उगाएं

मिर्च गर्मियों की फसल है। रोपाई से कटाई तक, टमाटर के पौधों को 2-3 महीने की आवश्यकता होती है। आमतौर पर, किसान नियंत्रित परिस्थितियों के अंतर्गत बीज की क्यारियों में 0.5-1 से (0.2-0.4 इंच) की गहराई में बीज बोना पसंद करते हैं, और इसके बाद उन्हें खेत में उनकी अंतिम स्थितियों में लगा देते हैं। हालाँकि, अगर आप बीज से मिर्च उगाने की सोच रहे हैं तो कुछ ऐसे तथ्य हैं, जिन्हें आपके लिए जानना आवश्यक है। सबसे पहले, मिर्च के बीजों को अंकुरित होने के लिए कम से कम 18 °C (64.4 °F) तापमान की आवश्यकता होती है। हम 20 और 30 °C (68-86 °F) के बीच के तापमान को सबसे उपयुक्त मानते हैं। दूसरी बात यह है कि अंकुरित होने के लिए बीजों में उचित नमी का स्तर बना रहना ज़रूरी है। किसान हर सीडिंग पॉट में दो बीज बोते हैं और उचित संचार एवं जल निकासी के लिए एक परत के रूप में टर्फ का प्रयोग करते हैं। इसके अलावा, मिर्च के बीजों को अंकुरण के लिए औसतन 70-75% के करीब आर्द्रता स्तरों की ज़रूरत पड़ती है। अत्यधिक सिंचाई से नुकसान हो सकता है। कुछ मामलों में, छोटे पौधों को दृढ़ीकरण अवधि की ज़रूरत हो सकती है। रोपाई से दो हफ्ते पहले किसान पौधों को धीरे-धीरे बाहर लाना शुरू करते हैं। शुरुआत में, वे पौधों को केवल दो घंटे के लिए बाहर छोड़ते हैं, और समय के साथ वो बाहर रखने के इस समय को बढ़ाते हैं।

पौधों से मिर्च कैसे उगाएं

किसान वैध विक्रेता से पौधे भी खरीद सकते हैं, या खुद बीजों से उगाये गए पौधों को खेतों में लगा सकते हैं। पौधे में 5-6 असली पत्तियां आने, और उनकी लम्बाई 15-30 सेमी (6-12 इंच) तक पहुंचने के बाद पौधों को खेतों में लगाना सही होता है।

शिमला मिर्च और मिर्च की खेती के लिए मिट्टी संबंधी ज़रूरतें और तैयारी

मिर्च के लिए किसी विशेष मिट्टी की ज़रूरत नहीं होती। ये विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में अच्छे से उगती है। हालाँकि, यह पौधा उचित वायु संचार और जल निकासी वाली मध्यम से रेतीली मिट्टियों में सबसे अच्छी तरह पनपता है। यह पौधा सूखी और गीली परिस्थितियों दोनों के प्रति संवेदनशील है। उचित पीएच स्तर 6 से 7 तक होता है; हालाँकि; हमने ऐसे मामले भी देखे हैं जहाँ पौधा लगभग 5.5 या 8 के बहुत अधिक पीएच स्तरों को भी सहन कर सकता है। मिर्च के पौधे रोपने से कुछ हफ्ते पहले ही मिट्टी को तैयार करना शुरू कर दिया जाता है। किसान पिछली किसी भी फसल के अवशेषों और खरपतवार को निकाल देते हैं और उसी समय अच्छे से जुताई करते हैं। इसके साथ ही, किसान मिट्टी से पत्थर और दूसरी अनचाही चीजें भी निकाल देते हैं।

एक हफ्ते बाद, मिट्टी के परीक्षण परिणामों की जांच करने और किसी स्थानीय लाइसेंस-प्राप्त कृषि विज्ञानी से परामर्श लेने के बाद, कई किसान शुरुआती खाद डालते हैं, जैसे सड़ी हुई गोबर की खाद या धीमी गति से निकलने वाला सिंथेटिक व्यावसायिक उर्वरक। ज्यादातर किसान ट्रैक्टर का इस्तेमाल करके, उसी दिन बुनियादी उर्वरक डाल देते हैं। कुछ किसान केवल रोपाई वाली पंक्तियों के ऊपर खाद डालना पसंद करते हैं, जबकि दूसरे किसान पूरे खेत में खाद डालते हैं। जाहिर तौर पर, पहली विधि ज्यादा किफायती है। इसका अगला दिन, ड्रिप सिंचाई की पाइपें लगाने का सबसे सही समय होता है। रैखिक पॉलीथिन कोटिंग अगला और सबसे महत्वपूर्ण चरण है (खासकर उन देशों में जहाँ मिर्च की खेती के मौसम में मिट्टी का तापमान कम होता है)। कई किसान काली या हरी इंफ्रारेड – संचारण (IRT) या काले प्लास्टिक के आवरण से पंक्तियों को ढँक देते हैं। वो जड़ वाले क्षेत्र का उचित तापमान (>21 °C या 70 °F) बनाये रखने और खरपतवार बढ़ने से रोकने के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल करते हैं।

जहाँ तक मिर्च की जैविक खेती की बात आती है, चीजें अलग हो सकती हैं, और किसान मिट्टी के पोषक तत्वों को बढ़ाने के लिए आवरण फसलों का इस्तेमाल कर सकते हैं। कृषि-पारिस्थितिकी एवं सतत खाद्य प्रणाली केंद्र, यूसी सांता क्रूस फार्म, के अनुसार मिर्च की जैविक खेती में मिर्च उगाने के मौसम से पहले पतझड़ में ही मिट्टी तैयार करना शुरू कर दिया जाता है। जिस साल हमें मिर्च उगानी है उससे पहले पतझड़ के दौरान एक आवरण फसल (उदाहरण के लिए, वेच – विसिया सटिवा) बो दी जाती है। मिर्च की रोपाई से लगभग एक महीने पहले (वसंत), वे मिट्टी की जुताई करके फसल को मिट्टी में मिला देते हैं, ताकि उनका खेत जैविक पदार्थ के साथ पोषक तत्वों से भरपूर हो सके। लगभग 14 दिन बाद, क्यारियां बनाने के लिए एक बार फिर ट्रैक्टर से जुताई की जाती है। जुताई के बाद, किसान कोई फसल न होने के बावजूद, खेत की सिंचाई करते हैं। स्प्रिंकलर उभरी हुई क्यारियों की सिंचाई करते हैं। इस तरह, खरपतवार के बीज अंकुरित हो जाते हैं। इसके बाद, किसान उन्हें हटा देते हैं। आमतौर पर, यह तकनीक चावल की खेती में इस्तेमाल होती है। एक हफ्ते बाद, वे छोटे-छोटे मिर्च के पौधों को लगाते हैं। रोपाई या तो बिल्कुल सुबह या फिर दोपहर के समय की जाती है।

मिर्च की रोपाई और पौधों के बीच की दूरी – प्रति हेक्टेयर और एकड़ कितने मिर्च के पौधे लगाएं

मिर्च की खेती मुख्य रूप से सर्दी के अंत में शुरू होती है, बशर्ते कि तापमान उचित स्तरों के आसपास होना चाहिए। कुछ देशों में, मिर्च के पौधे वसंत के दूसरे भाग में लगाए जाते हैं। उपयुक्त मौसम वाले देशों में किसान, पतझड़ की शुरुआत तक रोपाई जारी रखते हैं। अंत में, मिर्च उत्पादक गर्मी से सर्दी तक कटाई करते हैं (जून से दिसंबर)।

सभी तैयारियों के बाद (जुताई, बुनियादी उर्वरीकरण, सिंचाई प्रणाली की स्थापना और प्लास्टिक की चादर से ढंकना) हम रोपाई कर सकते हैं। किसान प्लास्टिक पर उन स्थानों पर निशान लगाते हैं जहाँ पौधों को रोपना होता है। इसके बाद वो प्लास्टिक पर गड्ढे बनाते हैं और छोटे पौधे लगाते हैं। पौधों को उसी गहराई में लगाना ज़रूरी होता है जितनी गहराई में उन्हें नर्सरी में लगाया गया था। उत्पादक एकल या दोहरी पंक्तियों में मिर्च के पौधे लगा सकते हैं। सहारा दिए गए और सहारा नहीं दिए गए पौधों के बीच की दूरियां भी अलग-अलग हो सकती हैं। एकल पंक्तियों में सहारा नहीं दिए गए पौधों को लगाने के लिए पंक्ति में पौधों के बीच 0.3 मीटर से 0.5 मीटर (12-20 इंच) की दूरी और पंक्तियों के बीच 0.5 मीटर से 0.75 मीटर (20-30 इंच) की दूरी का पैटर्न प्रयोग किया जाता है। एकल पंक्तियों में सहारा दिए गए मिर्च के पौधों के लिए, वे पंक्ति में पौधों के बीच 25-30 सेमी (10-12 इंच) की दूरी और पंक्तियों के बीच 120-150 सेमी (47-59 इंच) की दूरी रखना पसंद करते हैं। दोहरी पंक्तियों के लिए, कई किसान पंक्ति में पौधों के बीच 0.25 मीटर से 0.3 मीटर (10-12 इंच), पंक्तियों के बीच 0.5 मीटर से 0.6 मीटर (20-24 इंच), और जोड़ियों के बीच 1.2-1.5 मीटर (47-59 इंच) की दूरी रखना पसंद करते हैं।

परिणामस्वरूप, प्रति हेक्टेयर हम लगभग 18.000 से 45.000 पौधे (प्रति एकड़ 7.287-18.218 पौधे) लगाएंगे। दूरी और पौधों की संख्या मिर्च की किस्म, पर्यावरण की स्थिति, सिंचाई प्रणाली, छंटाई, और निश्चित रूप से, किसान के उपज के लक्ष्यों पर निर्भर करती है। (1 हेक्टेयर = 2,47 एकड़ = 10.000 वर्ग मीटर)।

मिर्च की छंटाई – क्या मिर्च को छंटाई की ज़रूरत होती है? मिर्च की छंटाई कैसे करें?

छंटाई खेती की सबसे महत्वपूर्ण गतिविधियों में से एक है और इसके कई फायदे हैं। हालाँकि, मिर्च की सभी किस्मों के लिए छंटाई की ज़रूरत नहीं होती है। छंटाई से किसानों को पौधे को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। इसके अलावा, छंटाई से वायु संचार अच्छा होता है और फफूंदी संक्रमणों से रोकथाम होती है। इसके अलावा, कटाई ज्यादा आसान हो जाती है। सामान्य तौर पर, छंटाई नहीं किये गए मिर्च में कई परिधीय टहनियां और पत्तियां आने लगती हैं। ज्यादा पत्तियों की वजह से किसान के लिए पौधे को संभालना मुश्किल हो जाता है। छंटाई की ज़रूरी प्रक्रिया में परिधीय टहनियों को हटाना शामिल होता है। उत्पादक पौधे पर केवल 2-4 टहनियां रखते हैं। इस तरह, पौधे को ज्यादा लचीला और प्रबंधनीय आकार मिलता है। कई किसान पौधों को पतला भी करते हैं। वे टहनी और पत्तियों के बीच उगने वाले तने को हटा देते हैं। तने को शिरा के बहुत करीब से काटने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। इसके बजाय, संक्रमण से बचने के लिए आप 4 सेमी (1.6 इंच) की दूरी रखने के बारे में सोच सकते हैं। वहीं दूसरी तरफ, छंटाई और सहारा देने के लिए मजदूरी का खर्च बढ़ जाता है, जो लम्बी कटाई की अवधि होने पर संतुलित की जा सकती है। बाज़ार में, हमें मिर्च की निश्चित किस्में मिल सकती हैं जो छंटाई के बिना संतोषजनक उपज देती हैं।

मिर्च के पौधों को सहारा देना

ज्यादातर मिर्च के किसान अपने पौधों को सहारा देते हैं। इस तकनीक के कई लाभ हैं। सबसे पहले, ये पत्तियों और फलों को ज़मीन से स्पर्श होने से रोकती है। साथ ही, पौधों में ज्यादा बेहतर वायु संचार होता है। इसके अलावा, इससे फसल की कटाई आसान हो जाती है। किसान डंडियों का प्रयोग करते हैं और उससे पौधों को धीरे से बाँध देते हैं।

मिर्च की पानी संबंधी ज़रूरतें और सिंचाई प्रणालियां

FAO के अनुसार, मिर्च की खेती की अवधि के दौरान मिर्च को कुल 600 से 900 मिमी पानी की ज़रूरत पड़ती है और खेती की लम्बी अवधियों और फसल की कई बार कटाई के लिए 1250 मिमी तक पानी की ज़रूरत पड़ती है। हालाँकि, पौधे के विभिन्न विकास चरणों के दौरान मिर्च की पानी की ज़रूरतें अलग-अलग होती हैं। सामान्य तौर पर, फल लगने, और फल भरने के दौरान सिंचाई करना बहुत ज़रूरी होता है। इन चरणों से पहले, पानी की ज़रूरतें कम होती हैं।

जाहिर तौर पर, अलग-अलग मौसम और मिट्टी की परिस्थितियों में पानी की ज़रूरतें पूरी तरह से अलग हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, भारी चिकनी मिट्टी के लिए आमतौर पर रेतीली मिट्टी की तुलना में कम सिंचाई की ज़रूरत होती है। इसके अलावा, शिमला मिर्च और मिर्च की अलग-अलग किस्मों के लिए पानी की अलग-अलग ज़रूरतें हो सकती हैं। भूमध्यसागरीय देशों में कई उत्पादक वसंत की शुरुआत में हर 4-5 दिन पर 10 मिनट के लिए अपनी मिर्च की सिंचाई करना पसंद करते हैं। इस तरह, वे पौधे को पानी की तलाश करने के लिए मजबूर करते हैं और इसके परिणामस्वरूप एक गहरी जड़ प्रणाली विकसित होती है। हालाँकि, फूल लगने से लेकर फसल की कटाई तक, वे लगभग हर दिन पौधों में पानी डालते हैं। किसान आमतौर पर अपने पौधों को सुबह या देर शाम को पानी देना पसंद करते हैं। पत्तियों पर पानी डालने से बीमारियों का प्रकोप हो सकता है। सामान्य तौर पर, विशेष रूप से, पत्तियों पर ज्यादा नमी से रोग का प्रकोप होने की संभावना बढ़ती है। दूसरी ओर, जिन पौधों को पर्याप्त पानी नहीं मिलता उनमें संक्रमण का खतरा ज्यादा होता है। मिर्च की खेती के लिए ज्यादातर ड्रिप सिंचाई का प्रयोग किया जाता है। कई किसान 12-20 मिमी व्यास की कई या एक ड्रिप पाइप का प्रयोग करते हैं और प्रति घंटे 2-8 लीटर पानी की आपूर्ति प्रदान करते हैं।

मिर्च का परागण

मिर्च के पौधे स्व-परागण होते हैं। इसका मतलब है कि किसानों को मिर्च का परागण बढ़ाने के लिए कीटों का प्रयोग करने की ज़रूरत नहीं पड़ती है। हालाँकि, अध्ययनों के अनुसार, कीट फलों के बड़ा होने की प्रक्रिया को तेज कर सकते हैं। हालाँकि, अगर किसान शिमला मिर्च और मिर्च एक साथ उगाते हैं तो उन्हें बहुत सावधान रहने की ज़रूरत पड़ती है। अगर वे मिर्च को शिमला मिर्च के बहुत अधिक करीब लगा देते हैं तो शिमला मिर्च, मिर्च में बदल सकती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शिमला मिर्च के पौधे अक्सर हवा या कीटों से संचारित किये गए मिर्च के पराग कणों से अपना परागण करने देते हैं। इस प्रभाव से बचने के लिए और अपने उत्पादों का व्यावसायिक मूल्य कम होने से रोकने के लिए, खेतों में मिर्च और शिमला मिर्च के बीच ज्यादा दूरी रखना बहुत ज़रूरी है।

मिर्च के खेत में खरपतवार प्रबंधन

मिर्च उगाते समय खरपतवार प्रबंधन बहुत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। मिर्च के पौधे अक्सर खरपतवार से ग्रस्त होते हैं जो स्थान, धूप, पानी और पोषक तत्वों के लिए उनसे मुकाबला करते हैं। इसके अलावा, खरपतवार उन कीड़ों का घर बन सकता है जो पौधों पर हमला करते हैं। सभी किसानों के लिए खरपतवार प्रबंधन की एक अच्छी नीति रखना ज़रूरी है, जो देशों, कानूनी संरचना, उत्पादन के साधनों, उस उद्योग जिसपर उत्पाद लक्षित होता है, आदि के आधार पर काफी अलग-अलग हो सकता है। कुछ मामलों (जैविक उत्पादन) में साप्ताहिक रूप से हाथ से खरपतवार पर नियंत्रण करना ज़रूरी होता है।

मिर्च की उर्वरीकरण संबंधी ज़रूरतें – मिर्च की खेती के लिए सामान्य उर्वरीकरण कार्यक्रम

उर्वरीकरण की कोई भी विधि प्रयोग करने से पहले, आपको मिट्टी के अर्द्धवार्षिक या वार्षिक परीक्षण के माध्यम से अपने खेत की मिट्टी की स्थिति पर विचार कर लेना चाहिए। कोई भी दो खेत एक जैसे नहीं होते, न ही कोई भी आपके खेत की मिट्टी के परीक्षण डेटा, ऊतक विश्लेषण और फसल इतिहास पर विचार किये बिना आपको उर्वरीकरण की विधियों की सलाह दे सकता है। फिर भी, हमने यहाँ उन ज्यादातर उर्वरीकरण विधियों की सूची दी है, जिन्हें आमतौर पर किसान इस्तेमाल करते हैं।

आमतौर पर, पौधों की रोपाई से लेकर फसल की कटाई तक, 2 से 3 महीने की सम्पूर्ण अवधि के दौरान किसान 0 से 10 बार तक खाद डालते हैं। कई किसान, पौधों की रोपाई और मिट्टी के कीटाणुशोधन से लगभग दो महीने पहले, पंक्तियों में अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद (प्रति हेक्टेयर 30-40 टन) डालते हैं। इसके अलावा, वे कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट: 600-800 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर, और पोटैशियम सल्फेट: 500 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर डाल सकते हैं।

हालाँकि, फर्टिगेशन मिर्च और शिमला मिर्च के खेत में खाद डालने की सबसे आम विधि है। यह शब्द उर्वरीकरण (फर्टिलाइजेशन) और सिंचाई (इरीगेशन) को मिलाकर बना है। इसमें किसान ड्रिप सिंचाई प्रणाली के अंदर पानी में घुलनशील उर्वरकों मिला देते हैं। इस तरह, पोषक तत्व मिट्टी में धीरे-धीरे मिलते हैं और इससे पौधे को उन्हें अवशोषित करने का उचित समय मिलता है। वे पौधे लगाने के कुछ दिन बाद फर्टिगेशन शुरू करते हैं। उस समय, वो नाइट्रोजन-फॉस्फोरस-पोटैशियम (स्टार्टर) 13-40-13 या 15-30-15 उर्वरक डालते हैं, जो ट्रेस तत्वों (सूक्ष्म पोषक तत्व) से भरपूर होता है। शुरुआती चरणों में फॉस्फोरस का उच्च स्तर मजबूत जड़ प्रणाली विकसित करने में पौधों की मदद करेगा। इसके अलावा, सूक्ष्म पोषक तत्व रोपाई की वजह से होने वाली किसी भी तनाव की स्थिति को दूर करने में पौधों की मदद करते हैं। वे एक बार फिर ट्रेस तत्वों से भरपूर नाइट्रोजन-फॉस्फोरस-पोटैशियम 20-20-20 या 15-15-15 के संतुलित उर्वरक का प्रयोग करके, फूल खिलने तक खाद डालना जारी रखते हैं। कुछ मामलों में, वे इस समय फॉस्फोरस की मात्रा अधिक करके फूल बढ़ा सकते हैं। जब पौधे पर फल लगने का समय करीब आता है तो वे इस अनुपात को एक बार फिर 15-5-30 या 10-15-20 में बदल देते हैं। इस समय, वे पोटैशियम का स्तर बढ़ा देते हैं क्योंकि अच्छे आकार के फल बनाने के लिए पौधों को इस तत्व की बहुत ज़रूरत होती है। इस चरण पर, पौधे की कैल्शियम की ज़रूरत भी बढ़ जाती है। कैल्शियम की कमी होने पर फलों में ब्लॉसम एन्ड रॉट नामक विकार दिखाई देता है, जिसकी वजह से मिर्च के निचले और किनारे वाले भाग सड़ जाते हैं। कुछ किसान फल लगने के दौरान पत्तियों पर कैल्शियम उर्वरक डालते हैं और 15 दिन बाद दोबारा इसे दोहराते हैं।

मिर्च के विकास को तीन अवधियों में बांटा जा सकता है।

वनस्पति विकास। रोपाई से 1 से 20 दिन

फूल और फल लगना। रोपाई से 21 से 55 दिन

फल बड़ा होना और कटाई। 56वें दिन से कटाई तक

पहली अवधि के दौरान, वे प्रति दिन प्रति हेक्टेयर 2 किलोग्राम नाइट्रोजन, 1 किलोग्राम P2O5 और 3 किलोग्राम K2O डालते हैं (फर्टिगेशन के माध्यम से)।

दूसरी अवधि के दौरान, किसान उर्वरीकरण की दर बढ़ाते हैं और प्रति दिन प्रति हेक्टेयर 4 किलोग्राम नाइट्रोजन, 1 किलोग्राम P2O5, और 5 किलोग्राम K2O प्रति हेक्टेयर लगाते हैं (फर्टिगेशन के माध्यम से)।

तीसरी अवधि के दौरान, ये दरें कम होती हैं, और किसान पहली अवधि के समान उर्वरक डालते हैं (फर्टिगेशन के माध्यम से)।

चूँकि, कुछ मिर्च की किस्में रोपाई के 55 दिन बाद और दूसरी किस्में रोपाई के 110 दिन बाद कटाई के लिए तैयार होती हैं, इसलिए आप यह समझ सकते हैं कि उपरोक्त वर्णित अवधियों की सीमाएं केवल औसत में बताई गयी हैं, और किसी को भी अपना खुद का शोध किये बिना इन निर्देशों का पालन नहीं करना चाहिए। ये बस कुछ सामान्य कार्यप्रणालियां हैं। मिर्च की किस्म, मिट्टी की स्थिति, अन्य स्थानीय कारकों को ध्यान में रखे बिना किसी को इनका पालन नहीं करना चाहिए। हर खेत और इसकी ज़रूरतें अलग होती हैं। कोई भी उर्वरीकरण विधि लागू करने से पहले मिट्टी की स्थिति और पीएच स्तर की जांच करना ज़रूरी है। आप अपने स्थानीय लाइसेंस प्राप्त कृषि विज्ञानी से इसपर परामर्श ले सकते हैं।

मिर्च की कटाई – मिर्च की फसल कब और कैसे काटें

मिर्च की ज्यादातर किस्में रोपाई के 2-3 मैंने बाद पूरी तरह बड़ी हो जाती हैं और कटाई के लिए तैयार होती हैं। फसल की कटाई मिर्च की किस्म, पर्यवरण की स्थितियों और रोपाई के समय पौधों की आयु पर निर्भर होती है। आमतौर पर, हरी किस्मों की तुलना में रंगीन किस्में देर से बड़ी होती हैं।

बड़े स्तर पर व्यावसायिक खेतों में, किसान कटाई के दौरान यांत्रिक उपकरणों का प्रयोग करते हैं। लेकिन, ज्यादातर मामलों में, मिर्च की कटाई हाथ से ही होती है। इसका सही समय अलग-अलग होता है। कई किसान अपनी फसलों को तब काटते हैं जब किस्म के आधार पर मिर्च उपयुक्त आकार तक बढ़ जाती हैं, लेकिन साथ ही कच्ची और हरी (हरी किस्मों के लिए) रहती हैं। रंगीन किस्मों के लिए अपनी किस्म का विशेष रंग आना शुरू हो जाना चाहिए। यह विशेष रूप से उन मिर्चों के लिए महत्वपूर्ण हैं, जिन्हें लम्बी दूरी तक ढोकर ले जाने की ज़रूरत होती है। कटाई की अवधि कई महीनों तक हो सकती है। इसलिए, किसान एक से ज्यादा कटाई सत्रों में फसल एकत्रित करते हैं (हर हफ्ते 2-3 सत्र)।

प्रति हेक्टेयर और एकड़ मिर्च की उपज – मिर्च की खेती में उपज

कई सालों के अनुभव के बाद प्रति हेक्टेयर 25 से 50 टन (प्रति एकड़ 22.314 – 44.628 पाउंड) की उपज को अच्छी उपज माना जाता है। कुछ मामलों में, अनुभवी उत्पादक प्रति हेक्टेयर 100 टन (प्रति एकड़ 89.255,87 पाउंड) तक की उपज भी पा सकते हैं। हालाँकि, ऐसी उपज कई वर्षों के अनुभव के बाद पेशेवर किसान ही हासिल कर पाते हैं।

मिर्च में सबसे सामान्य पोषक तत्वों की कमी

आपको यह समझना होगा कि किसी पौधे में पोषक तत्व की कमी का मतलब यह नहीं है कि मिट्टी खराब है। पौधों की कमियां विभिन्न पर्यावरणीय या अन्य कारकों के परिणामस्वरूप होती हैं, जो पौधे को किसी विशिष्ट पोषक तत्व को अवशोषित करने में असमर्थ बना देती हैं। इसलिए, अपने पौधे को कोई भी खाद देने से पहले किसानों को मिट्टी और ऊतक दोनों का परीक्षण करने के बारे में विचार करना चाहिए।

नाइट्रोजन की कमी

नाइट्रोजन की कमी होने पर पौधों की पत्तियां छोटी और पीली होने लगती हैं, विकास दर घट जाती है, और पौधे पर कम या कोई फल नहीं आते हैं। जिन मिर्चों पर फल आते हैं उनका आकार खराब होता है। ज्यादा बारिश और बहुत ज्यादा सिंचाई से हालात और बुरे हो जाते हैं।

पोटैशियम की कमी

पोटैशियम की कमी के लक्षण ज्यादातर अंतःशिरा क्लोरोसिस से दिखाई देते हैं। पुरानी पत्तियां मुरझाकर भूरी हो सकती हैं और झुलस सकती हैं। इसकी वजह से पौधे में फल कम आते हैं, और मिर्च सामान्य से छोटी होती है।

कैल्शियम की कमी

कैल्शियम की कमी होने पर फलों में ब्लॉसम एन्ड रॉट नामक विकार दिखाई देता है। इसका मतलब है कि फल के निचले सिरे पर एक चपटा भूरा धब्बा पड़ जाता है, जो मिर्च के विकास के किसी भी चरण पर दिखाई दे सकता है। ऐसी स्थिति में मिर्च का व्यावसायिक मूल्य तेजी से घटता है। ब्लॉसम एन्ड रॉट माध्यमिक फफूंदी संक्रमण के लिए अच्छा परिवेश प्रदान करता है।

मैग्नीशियम की कमी

मिर्च में मैग्नीशियम की कमी बहुत आम बात है और यह आमतौर पर पुरानी पत्तियों में दिखाई देती है। शिराएं हरी होने के बावजूद, पत्तियों का पीला होना इसका सबसे स्पष्ट लक्षण है।

फॉस्फोरस की कमी

फॉस्फोरस की कमी होने पर हमें सीमित विकास दिखाई देता है। पौधे को फूल उत्पन्न करने में मुश्किल होती है, और अगर फूल आते भी हैं तो कई फूलों में से केवल एक ही फल में बदलता है। पत्तियां पीली होकर मुरझा सकती हैं, जबकि फल अविकसित होते हैं, और उनमें बहुत कम बीज होते हैं।

मिर्च की सामान्य विसंगतियां 

धूप से जलना

बहुत ज्यादा समय तक धूप में रहने के कारण मिर्च की बाहरी परत जल जाती है। मिर्च की जिस सतह पर सीधी धूप पड़ती है, उस भाग का छिलका सफ़ेद रंग में बदल जाता है और सूखकर पतला हो जाता है। पत्ती की तुलना में फल के असामान्य अनुपात की वजह से ऐसा होता है।

फलों का फटना

लंबे सूखे के बाद, अचानक और ज्यादा पानी अवशोषित करने की वजह से फल फट जाते हैं।

सामान्य कीड़े और बीमारियां

कीड़े

लिरिओमाइज़ा

लिरिओमाइज़ा एसपीपी एक और कीड़ा है जो मिर्च सहित कई पौधों में छेद करता है। वयस्क पत्तियों, तने और फलों में छेद करके अपने अंडे देते हैं। अंडे से निकलने के बाद, लार्वा ऊतकों को खाना शुरू कर देता है जिसकी वजह से सफ़ेद छेद हो जाते हैं। इसकी वजह से पौधों की प्रकाश संश्लेषक क्षमता अक्सर बहुत कम हो जाती है, क्योंकि क्लोरोफिल युक्त कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं। संक्रमित पत्तियां गिर सकती हैं, जिसकी वजह से पौधे के तने हवा से प्रभावित होने लगते हैं, और फल धूप से जल जाते हैं। फल खराब होने की वजह से इसकी गुणवत्ता और वाणिज्यिक मूल्य में कमी आती है। इसने विशेष रूप से मैक्सिको में मिर्च को गंभीर नुकसान पहुंचाया है।

इसका प्रबंधन कठिन है। हालाँकि, इसके हमले को नियंत्रित करने के लिए कुछ सुरक्षात्मक उपाय किये जा सकते हैं।

इस कीड़े के लिए पौधे तक पहुंचना कठिन बनाना बहुत ज़रूरी है। कुछ सुरक्षात्मक उपायों में जाल का प्रयोग और खरपतवार हटाना शामिल है।

टेट्रानाइकस

टेट्रानाइकस यूर्टिका एक छोटा स्पाइडर माइट है जो मिर्च और टमाटर सहित कई फसलों पर हमला करता है। सर्दी के समय यह कीड़ा पत्तियों के ढेर में छिपा रहता है और गर्मियों के मौसम में टमाटर पर हमला करता है। यह खाने के लिए पत्तियों पर हमला करता है, जिसकी वजह से पत्तियां पीली या भूरे रंग की हो जाती हैं, जो आगे से जली हुई पत्तियों की तरह दिखती हैं। हमें पत्तियों के बीच जाले भी दिखाई दे सकते हैं।

फेरोमोन जालों के इस्तेमाल से निरंतर इनकी आबादी पर नज़र रखना एक अच्छी तकनीक है। अगर इनकी संख्या काबू से बाहर हो जाती है तो स्थानीय लाइसेंस प्राप्त कृषि विज्ञानी से परामर्श के बाद आप हस्तक्षेप करने के बारे में सोच सकते हैं। बाज़ार में जैविक और साथ ही रासायनिक समाधान मौजूद हैं, जिनका अच्छे कृषि अभ्यास के मानकों के अंतर्गत इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

थ्रिप्स

थ्रिप्स छोटे-छोटे कीड़े होते हैं जो खाने या अंडे देने के लिए ऊतकों पर छेद करके मिर्च के पौधे को नुकसान पहुंचाते हैं। वे सर्दियों में खरपतवार या पौधे के कूड़े में छिप जाते हैं, और वसंत आने पर, ये फूलों पर चले जाते हैं जहाँ ये उसके रस और पराग कण पर ज़िंदा रहते हैं। इसकी वजह से फूलों का आकार बिगड़ सकता है और ये गिर सकते हैं।

शिमला मिर्च और मिर्च के पौधों की सामान्य बीमारियां

बोट्राइटिस (ग्रे फफूंदी)

ग्रे फफूंदी मिर्च के पौधे की एक गंभीर बीमारी है, जो बोट्राइटिस सिनेरिया फफूंदी के कारण होती है। यह रोगाणु स्क्लेरोशिया के रूप में लंबे समय तक जीवित रह सकता है। उच्च स्तर की आर्द्रता से इस बीमारी को मदद मिलती है, साथ ही हवा और बारिश की वजह से इसके बीजाणु एक पौधे से दूसरे पौधे में फैलते हैं। इसके लक्षण पौधे के सभी भूमि के ऊपर के भागों में दिखाई दे सकते हैं। इसके लक्षणों में पत्तियों के किनारों पर बनने वाले ग्रे से भूरे रंग के निशान शामिल हैं। थोड़े समय बाद, ये निशान ग्रे फफूंदी से ढँक जाते हैं। पत्तियां सूखकर गिर जाती हैं। यह फफूंदी तने में लगकर पौधे को नष्ट कर देती है। फलों के संक्रमित होने पर मिर्च पर दिखाई देने वाला सफ़ेद धब्बा इसका प्रमुख लक्षण होता है। फल संक्रमित होने पर नरम और पिलपिला हो जाता है।

बीमारी पर नियंत्रण उचित सावधानी उपायों के साथ शुरू होता है। इनमें खरपतवार नियंत्रण और पौधों के बीच सुरक्षित दूरी रखना शामिल है। पौधों की सामान्य स्थिति (पोषक तत्व और जल स्तर, धूप) भी उनकी प्रतिरक्षा को बढ़ा सकती हैं। रासायनिक उपचार का प्रयोग केवल तभी किया जाता है जब समस्या गंभीर होती है और यह हमेशा स्थानीय लाइसेंस प्राप्त कृषि विज्ञानी की देखरेख में होता है। उचित स्वच्छता का ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है, जैसे कि हर बार पौधों से स्पर्श करने से पहले उपकरण का कीटाणुशोधन करना।

अल्टरनेरिया (अर्ली ब्लाइट)

यह मिर्च के पौधों पर लगने वाली गंभीर बीमारी है जो अल्टरनेरिया सोलानी फफूंदी की वजह से होती है। यह रोगाणु फसल के कूड़े, बीजों या खरपतवार में छिपकर सर्दियां काटता है और पानी, हवा, कीड़ों और खेती के उपकरणों के माध्यम से फैलता है। अल्टरनेरिया मिर्च को विकास के कई चरणों पर प्रभावित करता है। दुर्भाग्य से, अल्टरनेरिया फसल काटने के बाद भी फल को सड़ा सकता है।

सेप्टोरिया लीफ स्पॉट

सेप्टोरिया, सेप्टोरिया लाइकोपर्सिसिस फफूंदी की वजह से पत्तियों पर लगने वाली बीमारी है। बारिश के मौसम में इस रोगाणु को फैलने में मदद मिलती है और यह पत्तियों पर हमला करता है। इसकी वजह से पत्तियों पर काले धब्बे पड़ जाते हैं जो बैक्टीरियल स्पॉट और अल्टरनेरिया के घावों जैसे दिखाई देते हैं। दुर्भाग्य से, यह रोगाणु फसल कटने के बाद भी मिट्टी में रह सकता है, क्योंकि यह सोलनम कैरोलिनेंस जैसे सामान्य खरपतवारों में ज़िंदा रहता है।

लेट ब्लाइट (फाइटोफ्थोरा कैप्सिसी)

फाइटोफ्थोरा मिट्टी से होने वाली बीमारी है जो पौधे के लगभग हर एक भाग को प्रभावित करती है, जिसकी वजह से अंत में पौधा सूख जाता है। इसके लक्षण मुख्य रूप से जड़ और तने (तने का सड़ना) पर दिखाई देते हैं। इसके बाद यह बीमारी पत्तियों को प्रभावित करती है, जो मुरझा जाते हैं। धीरे-धीरे पौधे की पत्तियां गिर जाती हैं और यह मरने लगता है। बहुत ज्यादा पानी वाले क्षेत्रों में फल पर घाव के निशान दिखाई देने लगते हैं। इसके बाद फल पर सफ़ेद रंग की पाउडर जैसी फफूंदी लग जाती है। दुर्भाग्य से, यह रोगाणु 10 साल से ज्यादा समय तक मिट्टी में सर्दियां बिता सकता है। बारिश या पौधों पर ऊपर पानी डालने की वजह से संक्रमित मिट्टी के छींटे फलों पर पड़ने पर मिर्च के फल संक्रमित हो सकते हैं।

एन्थ्रक्नोस

एन्थ्रक्नोस मिर्च की एक अन्य सामान्य बीमारी है। यह कॉलेटोट्रीचम एसपीपी की वजह से होती है। इसका संक्रमण आमतौर पर गर्म और नमी वाले मौसम में होता है। यह रोगाणु पौधे के सभी भागों को संक्रमित कर सकता है। हालाँकि, हमें ज्यादातर पके हुए फलों पर इसके लक्षण दिखाई देते हैं। कच्चे फल भी संक्रमित हो सकते हैं, लेकिन उनपर लक्षण जल्दी नहीं दिखाई देते हैं। पकी हुई मिर्चों पर लक्षण सफ़ेद गोल धब्बों के रूप में दिखाई देता है जो समय के साथ बड़े होते हैं, धंसने लगते हैं, और एक साथ मिल जाते हैं। उपयुक्त आर्द्रता और तापमान में, गुलाबी रंग के फफूंदी के बीजाणु दिखाई देते हैं। दुर्भाग्य से, यह रोगाणु बीज में ज़िंदा रह सकता है। इसलिए, रोगजनक-रहित बीजों का इस्तेमाल करना आवश्यक है।

कोमल फफूंदी

कोमल फफूंदी ग्रीनहाउस में उगाये जाने वाली मिर्च की आम बीमारी है, जो पेरोनोस्पोरा टैबसीना फफूंदी के कारण होती है। इसके लक्षण पत्तियों की ऊपरी सतह पर पीले-हरे धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं। ज्यादा आर्द्रता वाले क्षेत्रों में, हमें पत्तियों की निचली सतह पर नीले से बैंगनी रंग के दाने दिखाई देते हैं। ज्यादा संक्रमित पत्तियां सूखकर गिर हैं। पत्तियां गिरने की वजह से पौधा बेकार हो जाता है और फसल को भारी नुकसान होता है।

पाउडरी फफूंदी

लेविलुला टॉरिका (अपूर्ण अवस्था = ओडियोप्सिस टॉरिका) सबसे आम फफूंदी प्रजातियां हैं, जिनकी वजह से मिर्च पर पाउडरी फफूंदी होती है। हमें पत्तियों की ऊपरी सतह पर माईसीलियम कवक की सफ़ेद पाउडरी फफूंदी दिखाई दे सकती है। इसके लक्षणों में पत्तियों की ऊपरी सतह पर हरे क्लोरोटिक कोणीय घाव भी शामिल हो सकते हैं। स्वस्थ पौधों में रोग फैलने से रोकने के लिए, संक्रमित पौधों पर काम करने के बाद, हमें अपने उपकरणों को हमेशा कीटाणुरहित करना चाहिए। दुर्भाग्य से, यह रोगाणु कई पौधों पर रह सकता है और एक संक्रमित पौधा दूसरे पौधों को संक्रमित कर सकता है। कैलिफोर्निया में, पाउडरी फफूंदी के बीजाणु प्याज, कपास, टमाटर, मिर्च की सभी किस्मों और कुछ घासफूस से आ सकते हैं।

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Wikifarmer की संपादकीय टीम
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