मुनाफे के लिए तरबूज की खेती करना – शुरू से अंत तक तरबूज की खेती के लिए मार्गदर्शक

तरबूज की खेती करना – उचित तरीके से और बड़े पैमाने पर तरबूज की खेती करने पर यह आय का अच्छा स्रोत बन सकता है। कुछ शब्दों में कहा जाए तो, व्यावसायिक प्रयोग के लिए तरबूज उगाने वाले ज्यादातर किसान आतंरिक सुरक्षित परिवेश में बीजों (संकर) से फसल शुरू करते हैं। छोटे पौधों के उगने का इंतज़ार करते हुए और उन्होंने रोपने की तैयारी करते हुए वो खेत तैयार करते हैं। वो खेत की जुताई करते हैं, क्यारियां या हल रेखा बनाते हैं और पंक्तियों पर काली प्लास्टिक की फिल्म बिछा देते हैं। काली प्लास्टिक की फिल्म न केवल मिट्टी को ज्यादा गर्म होने में मदद करती है, बल्कि जंगली घास भी नियंत्रित करती है। वो ड्रिप सिंचाई प्रणाली को डिज़ाइन और स्थापित भी करते हैं। पौधे लगाने के लिए तैयार होने पर, वो प्लास्टिक की फिल्म में छोटे-छोटे छेद बना देते हैं, जहाँ वो छोटे गड्ढे बनाकर पौधों की रोपाई करते हैं। ज्यादातर मामलों में उर्वरीकरण, ड्रिप सिंचाई और जंगली घास के प्रबंधन का प्रयोग किया जाता है। पौधों को कम करने की प्रक्रिया भी प्रयोग की जाती है। व्यावसायिक तरबूज उत्पादक खराब या अविकसित तरबूज को हटा देते हैं ताकि पौधे अपने संसाधनों को बड़े और ज्यादा स्वादिष्ट फल उगाने के लिए प्रयोग कर सकें। तरबूज की अधिकांश व्यावसायिक किस्मों को रोपाई के 78-90 दिनों के बाद काटा जा सकता है। कटाई केवल कैंची या चाकू के माध्यम से की जा सकती है। कटाई के बाद, तरबूज उगाने वाले किसान फसल के अवशेष को नष्ट कर देते हैं। बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए या मिट्टी को क्षय से बचाने के लिए, वो फसल चक्र भी प्रयोग कर सकते हैं।

तरबूज उगाते समय एक प्रतिबंधात्मक कारक हमेशा जलवायु होता है। तरबूज का पौधा अफ्रीका से आता है। यह कम तापमान और तुषार के प्रति बेहद संवेदनशील पौधा है। इसके लिए 18 से 35°C (65 से 95 °F) के औसत तापमान की आवश्यकता होती है, जबकि मिट्टी का तापमान 18 °C (65 °F) से कम नहीं होना चाहिए।  

सबसे पहले, तरबूज उगाने की विधि साथ ही साथ हमारे क्षेत्र में फलने-फूलने के लिए लगायी जाने वाली तरबूज की किस्मों का फैसला करना जरूरी है। तरबूज उगाने की 3 विधियां हैं: बीज से उगाना, नॉन-ग्राफ्टेड पौधों से उगाना और ग्राफ्टेड पौधों से उगाना।

बीज से तरबूज उगाना

तरबूज लंबी अवधि की फसल है। बाहर उगाने के लिए, उन्हें बोने से लेकर कटाई तक औसतन 100 से 120 दिनों की आवश्यकता होती है। हालाँकि, यदि आप बीज से तरबूज उगाने की योजना बना रहे हैं, तो कुछ ऐसे तथ्य हैं जिन्हें आपके लिए जानना आवश्यक है। सबसे पहले, अंकुरित होने के लिए तरबूज के बीजों को कम से कम 18 °C (65 ° F) मिट्टी के तापमान की आवश्यकता होती है। दूसरा, अंकुरित होने के लिए बीज के लिए नमी का सर्वोत्तम स्तर होना महत्वपूर्ण है। अधिक सिंचाई हानिकारक हो सकती है। कुछ उत्पादक बुवाई से एक दिन पहले मिट्टी को अच्छी तरह से पानी देते हैं और इसके बाद तब तक सिंचाई नहीं करते जब तक यह अंकुरित नहीं हो जाता है। हालाँकि, अगर मिट्टी बहुत अधिक रेतीली है और पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध पानी को संरक्षित करने में असमर्थ है तो यह एक अच्छी तकनीक नहीं है।

मौसम और मिट्टी की स्थितियों के आधार पर तरबूज के बीज 6-10 दिन में आसानी से अंकुरित हो जाते हैं।

जिन क्षेत्रों में तुषार का जोखिम होता है, वहां किसान नियंत्रित स्थितियों में बीज की क्यारियों में बीज बोना पसंद करते हैं और इसके बाद उन्हें अंतिम स्थितियों में लगा देते हैं। उचित वायु संचार के लिए आमतौर पर वे अंतर्निहित परत के रूप में घास बिछी हुई भूमि का प्रयोग करते हैं।

नॉन-ग्राफ्टेड पौधों से तरबूज उगाना

नॉन-ग्राफ्टेड पौधों से तरबूज उगाना तरबूज की खेती का एक और सामान्य तौर पर प्रयोग किया जाने वाला तरीका है। इस विधि का पालन करने पर, उस तरबूज की किस्म का ध्यान से चुनाव करना जरूरी होता है जिसे आप लगाने वाले हैं। जैसे, अगर हमारे क्षेत्र के खेतों में बीमारियों, कीड़ों, कम या ज्यादा पीएच या लवणता स्तरों की समस्या है तो सभी किस्में फल-फूल नहीं सकती हैं। कुछ किस्में इन कारकों को सहन कर लेती हैं, जबकि दूसरी नहीं कर पाती। सबसे सामान्य तौर पर प्रयोग की जाने वाली किस्मों में निम्न शामिल हैं: चार्ल्सटन ग्रे, क्रिमसन स्वीट, जुबली, ऑलस्वीट, रॉयल स्वीट, संगरिया, ट्रिपलोइड सीडलेस और ब्लैक डायमंड प्रकार।

ग्राफ्टेड पौधों से तरबूज उगाना

आजकल, बहुत से किसान तरबूज के ग्राफ्टेड पौधों का इस्तेमाल पसंद करते हैं। ग्राफ्टिंग एक सामान्य तौर पर इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक है, जिससे हम दो अलग-अलग पौधों के भागों को आपस में जोड़ देते हैं, ताकि वो एक पौधे के रूप में बढ़ सकें। पहले पौधे के ऊपरी हिस्से को साइअन कहा जाता है और यह दूसरे पौधे की जड़ प्रणाली पर विकसित होता है, जिसे रूटस्टॉक कहा जाता है। अंत में, हमारे पास वो पौधा होता है जो अपने अलग-अलग भागों के सभी फायदों को आपस में जोड़ता है। कुछ उत्पादक रूटस्टॉक पौधे और साइअन दोनों को बीज से उगाना पसंद करते हैं। इसके बाद, वो खुद ग्राफ्टिंग करते हैं, जबकि अन्य किसान वैध विक्रेताओं से प्रमाणित ग्राफ्टेड पौधे खरीदते हैं। वर्तमान में, स्क्वैश के रूटस्टॉक पर ग्राफ्ट किये गए तरबूज के साइअन का सबसे ज्यादा प्रयोग किया जाता है।

तरबूज की खेती के लिए मिट्टी की आवश्यकताएं और तैयारी

तरबूज 5,8 से 6,6 तक के पीएच स्तर वाली पोषक तत्वों से युक्त, थोड़ा रेतीले मिट्टी में सबसे अच्छे से पनपता है। इसे गीली मिट्टी पसंद नहीं है। खराब जल निकासी और वायु संचार वाली चिकनी मिट्टी में इसे लगाने से बचना चाहिए। तरबूज की खेती में रोपाई से पहले मिट्टी को अच्छे से तैयार करने की जरूरत होती है, ताकि उपज बड़ी और लाभदायक हो सके।

तरबूज के पौधे की रोपाई से लगभग 5 महीने पहले मिट्टी की सामान्य तैयारी शुरू हो जाती है। किसान उस समय अच्छी जुताई करते हैं। जुताई से मिट्टी में वायु संचार और जल निकासी में सुधार होता है। साथ ही, जुताई करने पर मिट्टी से कंकड़-पत्थर और दूसरी अनचाही चीजें निकल जाती है। जुताई के ठीक बाद टिलेज आता है। टिलेज ट्रैक्टर मिट्टी से जंगली घास निकाल देते हैं जिससे फसल को नुकसान पहुंच सकता है।

रोपाई से एक हफ्ते पहले कई किसान किसी स्थानीय लाइसेंस प्राप्त कृषि विज्ञानी से परामर्श के बाद,    जैविक खाद या सिंथेटिक व्यावसायिक खाद जैसे पूर्व-रोपाई खाद डालते हैं। चूंकि, तरबूज के पौधों को बढ़ने के लिए बहुत सारी जगह की आवश्यकता होती है, इसलिए किसान उन्हें पूर्वनिर्धारित दूरी पर लगाते हैं। परिणामस्वरूप, पूरे खेत में पूर्व-रोपाई खाद डालने की जरूरत नहीं होती। उन क्षेत्रों को चिन्हित करना जहाँ आप रोपाई करने वाले हैं और इसके बाद पंक्तियों में खाद डालना एक अच्छी तकनीक है। अगले दिन ड्रिप सिंचाई की पाइप लगाने का सही समय होता है। इसे लगाने के बाद, यदि मिट्टी के विश्लेषण में मिट्टी में संक्रमण की समस्या पता चली है तो कुछ किसान सिंचाई प्रणाली के माध्यम से मृदा कीटाणुशोधन पदार्थ भी डाल सकते हैं (अपने क्षेत्र में लाइसेंस प्राप्त कृषि विज्ञानी से पूछें)।

अगला और सबसे महत्वपूर्ण चरण है, एक सीधी रेखा में पॉलिथीन बिछाना (विशेष रूप से उन देशों में जहाँ तरबूज लगाने के मौसम के दौरान मिट्टी का तापमान पर्याप्त रूप से गर्म नहीं होता)। कई उत्पादक काले या हरे रंग के इन्फ्रारेड-संचारण (आईआरटी) या काली प्लास्टिक की फिल्म से पंक्तियों को ढंक देते हैं। वे इस तकनीक का उपयोग इसलिए करते हैं, ताकि जड़ क्षेत्र का तापमान उचित स्तर (>18 °C या 65 °F) पर बना रह सके और जंगली घास को बढ़ने से रोका जा सके।

तरबूज की रोपाई और पौधों के बीच दूरी

कई मामलों में, बाहर तरबूज लगाने के लिए वसंत का दूसरा भाग सबसे उपयुक्त होता है। उस समय, ज्यादातर मामलों में पाला पड़ने का खतरा गुजर गया होता है। किसान आमतौर पर 3 से 6 सप्ताह की आयु वाले पौधों को पसंद करते हैं। उस समय तक पौधों में अधिकतम 3 लताएं विकसित हो जाती हैं (उपयुक्त रूप से 1-2)।

रोपाई से 5 महीने पहले शुरू किये गए तैयारी के सभी चरणों के बाद (जुताई, सामान्य उर्वरीकरण, टिलेज, सिंचाई प्रणाली की स्थापना और प्लास्टिक से ढंकना), हम रोपाई शुरू कर सकते हैं। किसान पॉलीथिन की प्लास्टिक पर उन जगहों को चिन्हित कर देते हैं जहाँ वो छोटे पौधे लगाएंगे। इसके बाद वो प्लास्टिक पर छेद करके पौधे लगाते हैं। पौधों को उतनी ही गहराई में लगाना जरूरी है जितनी गहराई में उन्हें नर्सरी में लगाया गया था।

जहाँ तक रोपाई की दूरियों की बात है, 14 किलोग्राम तक के फल पैदा करने वाली किस्मों के लिए, आमतौर पर पंक्ति में पौधों के बीच 1 मीटर (3,28 फीट) की दूरी और पंक्तियों के बीच 3.5 मीटर (11,48 फीट) की दूरी होती है। इस पैटर्न से हमें प्रति हेक्टेयर 2000-2500 पौधे मिलेंगे। (1 हेक्टेयर = 2,47 एकड़ = 10.000 वर्ग मीटर)। दूरी और पौधों की संख्या तरबूज की किस्म, पर्यावरण की स्थिति और जाहिर तौर पर तरबूज के मनचाहे आकार पर निर्भर करती है, जिसे हमेशा बाजार निर्धारित करता है। उदाहरण के लिए, यदि हम प्रति हेक्टेयर अधिक पौधे लगाते हैं, तो हमें छोटे आकार के फल मिलेंगे। फल की छोटी किस्मों के लिए पंक्तियों के बीच 1,5 मीटर (5 फीट) और पंक्ति में पौधों के बीच 0,6 मीटर (1,9 फीट) की दूरी रखी जाती है। इस पैटर्न से, हम प्रति हेक्टेयर लगभग 11.000 पौधे लगाएंगे। (1 हेक्टेयर = 2,47 एकड़ = 10.000 वर्ग मीटर)।

तरबूज के लिए आवरण

गैर-उष्णकटिबंधीय देशों में, वसंत के मौसम में भी, हमेशा ठंड या भारी बारिश का खतरा होने कारण, ज्यादातर किसान निचले सुरंग वाले आवरण से छोटे पौधों की रक्षा करते हैं। रोपाई के ठीक बाद, वो प्लास्टिक या लोहे के खंभों के सहारे और सफेद प्लास्टिक के कवर से, 50 सेमी (1.6 फीट) ऊँचाई की सुरंग बनाते हैं। सरल शब्दों में कहें तो, वो छोटे ग्रीनहाउस बनाते हैं ताकि मनचाही जलवायु को बनाये रखा जा सके और छोटे पौधों को हानिकारक कारकों से बचाया जा सके।

लगभग 45 दिन बाद (मौसम की स्थिति के आधार पर), वो धीरे-धीरे हर दिन प्लास्टिक हटाना शुरू करते हैं, जब तक कि सभी पौधे नहीं खुल जाते हैं। कुछ दिन बाद, वो खेत से इसे पूरी तरह हटा देते हैं। सुरंग को धीरे-धीरे हटाना बहुत जरूरी है। नहीं तो, प्लास्टिक को अचानक हटा देने से पौधों को नुकसान होगा।

तरबूज की छंटाई – एक विवादास्पद विधि

कुछ तरबूज उत्पादक अपने तरबूजों की छंटाई करना पसंद करते हैं, वहीं दूसरों का दावा है कि छंटाई से विकास रुक जाता है और पौधे में फल देर से निकलते हैं। अपने पौधों की छंटाई करने वाले किसान, यह विकास के शुरूआती चरणों एक दौरान करते हैं, जब इसमें केवल 3-4 लताएं होती हैं, और पौधे की ज्यादातर गौण लताओं को हटा देते हैं। इस विधि से वो पौधे को मुख्य शाखा से विकसित होने के लिए विवश करते हैं।

तरबूज उगाने के सम्पूर्ण मौसम के दौरान वो अतिरिक्त पत्तियों को हटाते रहते हैं ताकि उचित वायु संचार बना रहे। इस तरह, वो नमी से उत्पन्न होने वाले पाउडरी फफूंदी जैसे संक्रमणों से पौधे को बचाते हैं।

तरबूज की पानी संबंधी जरूरतें और सिंचाई प्रणालियाँ

एफएओ के अनुसार, उगाने के पूरे मौसम के दौरान तरबूज को 400 से 600 मिमी तक पानी की जरूरत होती है। जाहिर तौर पर, अलग-अलग मौसम और मिट्टी की परिस्थिति के आधार पर पानी की जरूरतें बिल्कुल अलग हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, चिकनी मिट्टी के लिए आमतौर पर रेतीली मिट्टी की तुलना में कम पानी की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, वातावरण में ज्यादा नमी होने पर या बारिश के दिनों में सिंचाई की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं हो सकती है। दूसरी ओर, बहुत ज्यादा तापमान वाला सूखा दिन होने पर हर दिन एक बार सिंचाई करने की जरूरत पड़ सकती है।

ग्रीस जैसे भूमध्यसागरीय देशों में कई किसान, शुरूआती चरणों के दौरान प्रति दिन 20 मिनट तरबूज की सिंचाई करना पसंद करते हैं। फल आने के चरणों के दौरान, और तापमान में पर्याप्त वृद्धि  (> 35 °C) होने पर, वो सिंचाई सत्र बढ़ाते हैं क्योंकि इन चरणों पर पौधों को बहुत ज्यादा पानी की जरूरत होती है। इसके बाद, वो सिंचाई को बहुत ज्यादा कम कर देते हैं, और फल पकने के अंतिम चरणों के दौरान पानी देना लगभग बंद कर देते हैं। क्योंकि इन चरणों में अतिरिक्त पानी के कारण फल में दरार आ जाएगी। संयुक्त राज्य अमेरिका के कुछ राज्यों में, व्यावसायिक तरबूज उत्पादक प्रति सप्ताह औसतन 25 मिमी पानी प्रदान करते हैं। कई किसान शुरूआती चरणों में सुबह-सुबह अपने तरबूज को पानी देना पसंद करते हैं और तापमान बढ़ने पर देर शाम को पानी देते हैं।

आमतौर पर, तरबूज के लिए पानी की बहुत अधिक आवश्यकता होती है, लेकिन पत्ते को पानी देने को बीमारियों के प्रकोप से जोड़ा गया है। सामान्य रूप से , अधिक आर्द्रता से पाउडरी फफूंदी जैसे रोगजनकों का विकास हो सकता है। दूसरी ओर, पानी की कमी के कारण पौधे रोगों के लिए अतिसंवेदनशील हो जाते हैं।

इसके लिए आमतौर पर ड्रिप सिंचाई प्रणाली का प्रयोग किया जाता है।

तरबूज का परागण

तरबूज में फल लगने के लिए मधुमक्खियों और अन्य लाभकारी कीटों की गतिविधि जरूरी होती है जो पराग वितरित करते हैं। विशेषकर, बिना बीज वाली किस्में उगाते समय, तो 1 हेक्टेयर के लिए 1 या 2 मजबूत और स्वस्थ छत्ते रखना आवश्यक है। ग्रीनहाउस के अंदर तरबूज उगाने पर या हमारे पौधों के परागण के लिए क्षेत्र में मधुमक्खी की प्राकृतिक आबादी ज्यादा न होने पर, हस्तचालित परागण भी किया सकता है।

तरबूज की खाद संबंधी आवश्यकताएं

सबसे पहले, कोई भी खाद या टिलेज विधि प्रयोग करने से पहले, आपको अपने खेत की मिट्टी के अर्धवार्षिक और वार्षिक परीक्षण से मिट्टी की स्थिति को ध्यान में रखना चाहिए। कोई भी दो खेत समान नहीं होते, और न ही कोई आपकी मिट्टी के परीक्षण डेटा, ऊतक विश्लेषण और आपके खेत के फसल इतिहास को ध्यान में रखे बिना उर्वरीकरण विधियों की सलाह दे सकता है।

हालाँकि, हम काफी सारे किसानों द्वारा प्रयोग की जाने वाली, सामान्य उर्वरीकरण योजनाओं को यहाँ सूचीबद्ध करेंगे।

सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली उर्वरीकरण विधि है “फर्टिगेशन”। किसान ड्रिप सिंचाई प्रणाली में पानी में घुलनशील उर्वरकों को मिला देते हैं। इस तरह, वो धीरे-धीरे पोषक तत्व प्रदान कर सकते हैं और पौधों को उन्हें अवशोषित करने का उचित समय देते हैं।

आजकल किसान 3 महीने की संपूर्ण तरबूज उगाने की अवधि के दौरान 0 से 10 बार खाद डालते हैं (रोपाई से फसल काटने तक)। कई किसान रोपाई से एक सप्ताह पहले पंक्तियों में गोबर की खाद जैसे पूर्व-रोपाई खाद डालते हैं और साथ ही रोपाई के 2 दिन बाद फर्टिगेशन शुरू करते हैं। उस समय, वे सूक्ष्म तत्वों से भरपूर, नाइट्रोजन-फॉस्फोरस-पोटैशियम 12-48-8 उर्वरक डालते है। शुरूआती चरणों में फॉस्फोरस का उच्च स्तर पौधों की मजबूत जड़ प्रणाली विकसित करने में मदद करेगा। इसके अतिरिक्त, कई मामलों में सूक्ष्म पोषक तत्व पौधों के लिए प्रत्यारोपण के कारण उत्पन्न होने वाली किसी भी नुकसानदायक स्थिति का सामना करना आसान बनाते हैं।

अगले 3 बार (1 प्रति सप्ताह) 15-30-15 और 12-48-8 बारी-बारी से डाला जाता है।

अगले 4 हफ्तों के लिए, वे हर प्रयोग के बीच 3 से 4 दिन का समयांतराल रखते हुए आपस में बदल-बदलकर 20-20-20 और Ca(NO₃)₂ डालते हैं।

अगले 2 हफ्ते वो कोई खाद नहीं डालते। 11वें सप्ताह में, वो 20-20-20 डालते हैं जब तक कि फल अपने वजन के ⅔ तक नहीं पहुंच जाता है। इसके बाद से, वो अपने तरबूज में KNO3 डालना शुरू कर देते हैं। फल पकने के अंतिम चरण पर, वो Κ₂SO4 डालना शुरू करते हैं। इन चरणों पर, पौधों को आमतौर पर पोटैशियम की ज्यादा जरूरत होती है ताकि पौधे में ज्यादा मीठे, बड़े और अच्छे आकार के फल आएं।

हालाँकि, ये केवल सामान्य पैटर्न हैं जिनका अपना खुद का शोध किये बिना पालन नहीं करना चाहिए। हर खेत अलग है और इसकी अलग-अलग जरूरतें हैं। किसी भी उर्वरीकरण विधि का प्रयोग करने से पहले मिट्टी के पोषक तत्वों और पीएच की जाँच महत्वपूर्ण होती है। आप अपने स्थानीय लाइसेंस प्राप्त कृषि विज्ञानी से परामर्श ले सकते हैं।

तरबूज के कीड़े और बीमारियां

फसल चक्र कीड़ों और बीमारियों के खिलाफ पहली सावधानी है। दूसरी सावधानी बरतने के रूप में आप केवल प्रमाणित और बीमारी रहित बीज और पौधे खरीद सकते हैं।

कीड़े

थ्रिप्स

थ्रिप्स पल्मी पतले-पतले कीड़े होते हैं जो पत्तियों का रस चूसकर तरबूजों पर हमला करते हैं। धूप और गर्म मौसम इनके संक्रमण में मदद करता है। थ्रिप्स प्रबंधन उचित निवारक उपायों के साथ शुरू होता है। इनमें जंगली घास पर नियंत्रण और फसल चक्र शामिल हैं।

उनकी आबादी पर हर समय नज़र रखना अच्छी तकनीक हो सकती है। अगर उनकी संख्या बहुत ज्यादा बढ़ जाती है तो आप हस्तक्षेप करने पर विचार कर सकते हैं, लेकिन उससे पहले हमेशा अपने स्थानीय लाइसेंस प्राप्त कृषि विज्ञानी की सलाह लें। बाजार में जैविक के साथ-साथ रासायनिक समाधान भी मौजूद हैं, जिन्हें हमेशा गैप के मानकों और स्थानीय लाइसेंस प्राप्त कृषि विज्ञानी की देख-रेख में प्रयोग किया जाना चाहिए।

एफिड्स

एफिड्स रस चूसकर पौधे को कमजोर बनाते हैं। पत्तियां मुड़कर सिकुड़ने लगती हैं। इसके अलावा, एफिड्स कई वायरस रोगों को प्रसारित करता है।

टेट्रानाइकस यूर्टिका

यह घुन मुख्य रूप से यूरोपीय देशों में दिखाई देता है। हालाँकि, आजकल यह एक अमेरिका की भी समस्या बना हुआ है। यह पत्तियों, तने और फलों को नुकसान पहुंचाता है। इसकी वजह से पत्तियों पर क्लोरोटिक स्पॉट बनते हैं। घुन की वजह से फलों का रंग उतर जाता है, और जिसकी वजह से उनकी गुणवत्ता में कमी आती है।

बीमारियां

एन्थ्रेक्नोज

एन्थ्रेक्नोज एक ऐसी बीमारी है जो ज्यादातर पत्तियों और लताओं को गंभीर नुकसान पहुंचाती है। यह कलेटोट्रीचम लगेनरियम के कारण होता है। ठंडा और गीला मौसम फफूंदी के बीजाणुओं को पसंद है। सूखा और गर्म मौसम बीमारी के चक्र को रोकता है, जो मौसम की स्थितियां दोबारा उचित होने पर दोबारा शुरू हो जायेगा। इसके लक्षण मुख्य रूप से पुराने पत्तों पर दिखाई देते हैं, जिसकी वजह से उनपर भूरे रंग के परिगलित धब्बे पड़ जाते हैं। हम तनों, फूलों और फलों पर भी उनके नुकसान को देख सकते हैं।

एन्थ्रेक्नोज पर नियंत्रण उचित निवारक उपायों से शुरू होता है। इसमें शामिल हैं: अच्छे वायु संचार के लिए उचित छंटाई सहित, जंगली घास पर नियंत्रण और पौधों के बीच उचित दूरियां। पौधों के लिए उचित पोषक तत्व और पानी का स्तर भी उनकी प्रतिरक्षा क्षमता को बढ़ा सकता है। समस्या ज्यादा गंभीर होने पर, हमेशा किसी लाइसेंस प्राप्त कृषि विज्ञानी की देखरेख में अक्सर रासायनिक उपचार प्रयोग किया जाता है।

कोमल फफूंदी

कोमल फफूंदी पेरोनोस्पोरा या प्लास्मोपारा जीनस के सूक्ष्मजीवों के कारण होता है। इसके लक्षण आमतौर पर बारिश के बाद या उच्च आर्द्रता (अक्सर वसंत के दौरान) के दिनों के दौरान पत्तियों पर दिखाई देते हैं। जब हमारे पौधे कोमल फफूंदी से संक्रमित होते हैं, तो हम हल्के पीले या भूरे रंग के धब्बे देख सकते हैं। कोमल फफूंदी पर नियंत्रण उचित निवारक उपायों से शुरू होता है। इसमें शामिल हैं: अच्छे वायु संचार के लिए उचित छंटाई सहित, जंगली घास पर नियंत्रण और पौधों के बीच उचित दूरियां। समस्या ज्यादा गंभीर होने पर, हमेशा किसी लाइसेंस प्राप्त कृषि विज्ञानी की देखरेख में अक्सर रासायनिक उपचार प्रयोग किया जाता है।

पाउडरी फफूंदी

पाउडरी फफूंदी, फफूंदी की कई विभिन्न प्रजातियों के कारण होता है। हालाँकि, एरीसिपल्स और पोडोस्फेरा ज़ैंथी इनमें सबसे आम हैं। हम वास्तव में पत्तियों पर सफेद पाउडर जैसी फफूंदी देख सकते हैं। जैसे ही पाउडरी फफूंदी वाहिकाओं के माध्यम से आगे फैलता है, पत्तियां भूरे रंग की हो जाती हैं और अंत में गिर जाती हैं। पाउडरी फफूंदी के नियंत्रण के लिए वही चरण शामिल हैं, जो कोमल फफूंदी के लिए हैं। संक्रमण को स्वस्थ पौधों तक फैलने से रोकने के लिए हमें अपने उपकरणों को हमेशा कीटाणुरहित करना चाहिए।

तरबूज की कटाई, उपज और भंडारण

तरबूज की अधिकांश किस्में रोपाई के 78 से 90 दिनों के बाद पूरी तरह पककर तैयार हो जाती हैं। कटाई के लिए तैयार होने पर, ज्यादातर मामलों में हम उनके छिलके पर एक पीले धब्बे को देख सकते हैं जो मिट्टी से जुड़ा होता है। इसके अलावा, हमें उस भाग पर एक सूखा हुआ तंतु दिखाई दे सकता है जिससे तना लता से जुड़ा होता है।

परागण का समय अलग-अलग होने के कारण, सभी तरबूज एक ही समय पर नहीं पकते हैं। इसलिए, हमें एक ही खेत को एक से अधिक बार काटना पड़ सकता है।

तरबूज की कटाई केवल हाथ से की जा सकती है। हमें तरबूज को काटते समय सावधान रहना चाहिए और इसे खींचना नहीं चाहिए, नहीं तो फल फट सकते हैं, और इसके कारण उन्हें बाजार में नहीं बेचा जा सकेगा।

कुछ वर्षों के अनुभव के बाद प्रति हेक्टेयर 50 से 80 टन की अच्छी उपज होने लगती है। व्यावसायिक तरबूज के खेतों में, हम हर पौधे से 1,5 से 2 पूरे आकार के तरबूज की फसल की उम्मीद कर सकते हैं।

इसके बाद तरबूज को ठंडी जगह भेज दिया जाता है, लेकिन 10 °C ( 50 °F) तापमान वाले बेहद ठंड भंडारण क्षेत्रों में नहीं।

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