आलू कैसे उगाएं

Growing Backyard Potatoes

आंगन में आलू की खेती

संक्षेप में, हम सर्दियों के अंत समय में, बसंत (ज्यादातर क्षेत्रों में फरवरी-अप्रैल) या गर्मियों के दौरान (ज्यादातर क्षेत्रों में जुलाई-अगस्त) उभरी हुई मिट्टी के टीले में आलू के बीज लगाते हैं। आमतौर पर, बीज रोपने के 3-4 महीने बाद, हम भूमि के अंदर निकलने वाले आलुओं की फसल प्राप्त कर सकते हैं। उपज पाने के बाद, हम शेष पौधों को नष्ट करने के लिए गहराई से जुताई करते हैं। सामान्य तौर पर, हमें लगातार दो साल तक एक ही खेत में आलू की खेती नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इसके कारण मिट्टी क्षीण हो जाएगी और रोग फैलने का खतरा ज्यादा होगा।

हम आलू के बीजों की खरीदारी के साथ शुरुआत करते हैं। प्रतिष्ठित विक्रेताओं के पास से आलू के प्रमाणित रोगमुक्त बीज लेना अच्छा होता है। बीज वाले आलू सामान्यतः वही आलू होते हैं जिन्हें हम खाने के लिए प्रयोग करते हैं, लेकिन उन्हें मनचाही विशेषताएं पाने के लिए चुना जाता है। विभिन्न रोगों के लिए उनकी जांच की जाती है या कीटाणुशोधन भी किया जाता है। वैकल्पिक रूप से, हम वही आलू उगा सकते हैं जो हम सब्जियों की दुकान से खरीदकर लाते हैं, लेकिन उनके चयन के लिए अनुभव की जरुरत होती है और हमें उत्पादित आलुओं की मात्रा और अंतिम वजन में काफी कम परिणामों की अपेक्षा करनी चाहिए। ज्यादातर माली और किसान आलू के बीजों को छोटे टुकड़ों में काट देते हैं (आलू काटने के अपने लाभ और नुकसान हैं)। प्रत्येक टुकड़े पर कम से कम एक बीज छोड़ दें। सामान्य तौर पर, हम बड़े आलू की गांठों (व्यास > 45 मिमी) को काट सकते हैं, जबकि छोटी गांठों को पूरा लगा सकते हैं। हम बीज वाले आलू के टुकड़ों को 2 दिन तक सूखे स्थान में रखते हैं। इसके बाद, हमें आमतौर पर कटे हुए आलू की सतह पर पपड़ी दिखाई देने लगेगी। उस समय, हम उन्हें लगाने के लिए तैयार होते हैं।

आलू के बीज रोपने से पहले गहराई तक जुताई करना और कंकड़-पत्थरों को हटाना जरुरी होता है। आलुओं को टीलों पर उगाया जाता है। सबसे पहले हम 4-6 इंच (10-15 सेमी) गहराई का एक गड्ढा खोदते हैं। गड्ढे की लम्बाई हमारे पास उपलब्ध आलू के बीजों की मात्रा पर निर्भर करता है। अगला गड्ढा पहले वाले से कम से कम 28 इंच (70 सेमी) की दूरी पर होना चाहिए। इसके बाद हम गड्ढों को मिट्टी से भरकर अपने खेत को सपाट कर देते हैं। उस समय, आपको टीले बनाकर अपनी फसलों को ज़मीन से ऊपर करने की जरुरत होती है। हम ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि समतल सतह पर आलू उगाने से हमारे आलू के पौधों को बढ़ने और अच्छी पैदावार देने में मदद नहीं मिलेगी। इसके अलावा, गड्ढों के बीच मिट्टी को ऊपर जमा करने से हमें यह पता लगाने में भी मदद मिलती है कि हमारे बीजों की पंक्ति कहाँ स्थित है। कई किसान गड्ढों के बीच की दूरी को सिंचाई के माध्यम के रूप में भी प्रयोग करते हैं। इसलिए, हमें पौधों के आधार से लगभग 4 इंच (10 सेमी) ऊंचाई पर पंक्ति के प्रत्येक किनारे से मिट्टी को ऊपर करके टीला बनाना चाहिए।

पौधे रोपने के लगभग दो महीने बाद, हमें स्वस्थ और विकसित आलू के पौधे दिखाई देने लगेंगे। उस समय, हमें दोबारा अपनी फसलों की मिट्टी को ऊपर करना होगा, ताकि कोई भी आलू सतह तक ना पहुंचें और धूप में ना आये। धूप में पड़ने पर, आलुओं के हरे रंग की होने की संभावना होती है और ये मानव उपभोग के लिए अनुपयुक्त हो जाते हैं। उस समय (पौधे लगाने के दो महीने बाद), हम आवश्यकतानुसार मिट्टी या पत्तियों के खाद डालने के बारे में भी विचार कर सकते हैं (यह खेत पर निर्भर करता है – प्रत्येक खेत और इसकी जरूरतें अलग होती हैं)। हमें पत्तियों के आकार और रंग का ध्यानपूर्वक निरीक्षण करके कीड़े और रोगों की भी जांच करनी चाहिए। आलू की पानी संबंधी कुछ जरूरतें होती हैं; लेकिन आपके खेत की जलवायु और वाष्पीकरण से निर्धारित किया जाता है कि इसे कितनी बार सिंचाई की जरुरत पड़ेगी। यदि आपके क्षेत्र में बिलकुल बारिश नहीं है तो आपको खेती की अवधि के दौरान सप्ताह में एक बार से लेकर महीने में एक बार तक अपने पौधों की सिंचाई करने की जरुरत पड़ सकती है।

हम अपनी जलवायु और बीज की किस्म के आधार पर पौधे रोपने के लगभग 3-4 महीने बाद, अपनी आलू की फसल पाने के लिए तैयार होते हैं। जब आलू की पत्तियां गिरने लगती हैं तो आलू कटाई के लिए तैयार होते हैं। कई किसान इस समय से लेकर दो और सप्ताह तक प्रतीक्षा करते हैं, जबकि अन्य किसान पत्तियां पीली पड़ते ही आलू उखाड़ना शुरू कर देते हैं। हम आलुओं को खोजते हुए, बीज वाली पंक्ति के बीच मिट्टी को ध्यानपूर्वक खोदते हैं। सभी आलू निकालने के बाद, उन्हें खेत में कुछ घंटों के लिए धूप में छोड़ना लाभदायक होता है (बशर्ते कि बारिश की कोई संभावना ना हो), ताकि वे प्राकृतिक रूप से सूख सकें।

आलू के पौधे से संबंधित जानकारी

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आलू की फसल, उपज और संग्रहण

आलू से संबंधित प्रश्न और उत्तर

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Wikifarmer की संपादकीय टीम
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