अंगूर की बेल के सामान्य कीड़े और बीमारियां

कीड़े

फिलॉक्सेरा

फिलॉक्सेरा वेस्टाट्रिक्स (प्लानशोन), अंगूर की बेल की जड़ प्रणाली के लिए इतना विनाशकारी एफिड है कि इसकी वजह से ही यूरोप में ग्राफ्टेड पौधों का प्रयोग शुरू करना पड़ा था। यह कीड़ा मूल रूप से अमेरिका का है, जहाँ अधिकांश अंगूर की किस्मों ने इसके खिलाफ प्रतिरक्षा विकसित कर ली है। यूरोप में, यह पहली बार 1850-60 के आसपास दिखाई दिया था और तब से अंगूर के सबसे बड़े दुश्मनों में से एक है। ये कीड़े पौधे की जड़ और पत्तियां खाते हैं। हम जड़ों और कभी-कभी पत्तियों के समूह पर पित्त दिखाई देने पर फिलॉक्सेरा को पहचान सकते हैं। जड़ों की क्षति विनाशकारी होती है, और ये कीड़े पौधे की जड़ प्रणाली को पूरी तरह से नष्ट कर सकते हैं। यूरोपीय किस्मों के लिए इसका एकमात्र प्रबंधन उपाय है उन्हें अमेरिकी रूटस्टॉक पर ग्राफ्ट करना है, क्योंकि कुछ अमेरिकी किस्में एफिड के लिए प्रतिरोधक क्षमता रखती हैं।

यूरोपियन ग्रेपवाइन मोथ

लोबेशिया बोट्राना मूल रूप से इटली का कीड़ा है और यूरोप के सबसे आम अंगूर के कीड़ों में से एक है। अमेरिका में, पिछले दशक के दौरान पहली बार इसकी उपस्थिति दर्ज़ की गयी थी। यह अंगूर पसंद करता है, लेकिन यह रोज़मेरी के पौधे या बादाम के पेड़ पर भी हमला कर सकता है। मादा प्रति दिन 30 से अधिक अंडे दे सकती है। शुरूआती लार्वा पत्तियां खाते हैं, लेकिन अगली पीढ़ी अंगूर के फल खाती है जिससे उपज कम हो जाती है।

निवारक उपायों में फेरोमोन जाल, फसल की निरंतर निगरानी, और जंगली घासफूस हटाना शामिल है। इसके लिए, फेरोमोन जाल सामान्य तौर पर प्रयोग की जाने वाली तकनीक है। ये नर कीड़ों को आकर्षित करके प्रजननक्षम मादाओं से दूर रखती है। इस प्रकार, उनका प्रजनन कम होता है। केवल गंभीर समस्या के मामलों में रासायनिक नियंत्रण का प्रयोग किया जाना चाहिए और यह हमेशा किसी लाइसेंस प्राप्त कृषि विज्ञानी की देखरेख में होना चाहिए।

ग्रेप बेरी मोथ

ग्रेप बेरी मोथ, एंडोपिज़ा विटेना या पैरालोबेशिया विटेना, मूल रूप से उत्तरी अमेरिका का कीड़ा है। यह कीड़ा व्यावसायिक अंगूर के खेतों को गंभीर आर्थिक क्षति पहुंचा सकता है। हर साल इस मोथ की 2 या 3 पीढ़ियां विकसित होती हैं। वयस्क सर्दियां सहन कर लेते हैं और खिलने के चरण से पहले, वसंत के अंत में या गर्मियों की शुरुआत में फूलों के गुच्छों पर पहली पीढ़ी के अंडे देना शुरू करते हैं। अगली पीढ़ियों के लार्वा खाने के लिए फलों पर हमला करते हैं, जिससे गंभीर क्षति होती है। अगर हमारे अंगूर ग्रेप बेरी मोथ के हमले से पीड़ित होते हैं तो हम फलों और फूलों के आसपास जाले देख सकते हैं। हम फल की सतह पर काले छेद भी देख सकते हैं (लार्वा बेरी में घुस जाते हैं)। इससे ग्रस्त फल न केवल बाज़ारों में बिकने लायक नहीं रह जाते, बल्कि इससे गंभीर फफूंदी संक्रमणों का भी जोखिम होता है। कुछ निवारक उपायों में फेरोमोन जाले, निरंतर निगरानी और जंगली घास हटाना शामिल है। फसल पर हमला होने के बाद, इसका प्रबंधन ज्यादा कठिन होता है। क्योंकि ये कीड़े कीटनाशकों के लिए प्रतिरक्षा क्षमता विकसित कर लेते हैं, इसलिए जैविक नियंत्रण से इसपर नियंत्रण करना सबसे अच्छा तरीका है। दुर्भाग्य से, ये कीड़े अपनी सर्दियां मिट्टी में रहकर बिता सकते हैं।

जापानी बीटल

अपने नाम के बावजूद, जापानी बीटल (पोपिलिया जपोनिका), जापान में उतनी तबाही नहीं मचाता, जितनी कि संयुक्त राज्य में मचाता है। इसके आकार (15 मिमी या 0.59 इंच) के कारण, हम इस बीटल को नंगी आँखों से देख सकते हैं। ये बीटल मिट्टी में रहकर अपनी सर्दियां बिताते हैं और वसंत के दौरान हमला शुरू करते हैं। ये बीटल विभिन्न पौधों की प्रजातियों (सब्जियों, पेड़ों, फूलों, आदि) पर हमला करते हैं। जहाँ तक अंगूर के खेतों की बात है, वे पत्तियों को पूरा खा जाते हैं। इसके प्रबंधन में निवारक साथ ही हमला नियंत्रित करने के लिए रासायनिक उपाय शामिल हैं। कुछ निवारक उपायों में फेरोमोन जाले, लगातार निगरानी, और जंगली घास हटाना शामिल है। कुछ मामलों में हमेशा स्थानीय लाइसेंसधारी कृषि विज्ञानी से परामर्श लेने के बाद, पाइरेथ्रिन आधारित कीटनाशकों का प्रयोग किया जाता है।

बीमारियां

कोमल फफूंदी

कोमल फफूंदी अंगूर की शायद सबसे गंभीर बीमारी है, जो ज्यादातर गर्म और आर्द्र जलवायु वाले क्षेत्रों में फैलती है। यह प्लास्मोपारा विटिकोला फफूंद के कारण होती है और इसकी वजह से पूरी फसल बर्बाद हो सकती है। वसंत और गर्मियों की बारिश बीमारी के प्रसार में साथ देती है। रोगाणु कलियों, पत्तियों या मिट्टी पर पड़ी सूखी पत्तियों पर अपनी सर्दियां बिताते हैं। यह रोग कलियों, पत्तियों, फूलों, फलों और तनों को प्रभावित करता है। पत्तियों की ऊपरी सतह पर तेल के धब्बे दिखाई देते हैं जो मोज़ेक जैसे लगते हैं। पत्तियों की निचली सतह पर, हम सफेद फफूंदी देख सकते हैं। टहनियों का परिगलन एक अन्य सामान्य लक्षण है। इस फफूंदी की वजह से फूल के गुच्छे भी प्रभावित होते हैं, और सूखकर गिर सकते हैं। यदि यह संक्रमण बाद के चरण में होता है, जब पौधे पर फल होते हैं, तो अंगूर कठोर, भूरे होकर, सिकुड़कर अंत में गिर सकते हैं।

बीमारी का नियंत्रण उचित निवारक उपायों के साथ शुरू होता है। इनमें उचित छंटाई, और भूमि पर पड़े मृत पौधे के ऊतकों को हटाने सहित जंगली घास पर नियंत्रण और पौधों के बीच सुरक्षित दूरी रखना शामिल है। फसल की सामान्य स्थिति (पोषक तत्व और जल स्तर, धूप, वायु संचार) भी उसकी प्रतिरक्षा क्षमता को बढ़ा सकती है। संक्रमित पौधे पर सीधे धूप पड़ने पर बीमारी के तेज प्रसार में देरी हो सकती है। हर बार पौधों को छूने पर उपकरण कीटाणुशोधन जैसे उचित स्वच्छता मानकों का प्रयोग करना भी महत्वपूर्ण है।

रासायनिक उपचार का प्रयोग केवल तभी किया जा सकता है जब समस्या गंभीर होती है और यह हमेशा स्थानीय लाइसेंस प्राप्त कृषि विज्ञानी की देखरेख में होना चाहिए। 1880 से इसके लिए कॉपर के यौगिकों का प्रयोग किया जा रहा है। हालाँकि, आज भी, कॉपर आधारित कवकनाशी का प्रयोग किया जाता है, लेकिन बाज़ार में कई विकल्प मौजूद हैं, जिनमें जैव नियंत्रण एजेंट, जानवरों से उत्पन्न सामग्रियां, पौधे के अर्क (साल्विया ऑफिसिनैलिस) और अन्य शामिल हैं।

पाउडरी फफूंदी

पाउडरी फफूंदी अंगूर की बेलों की एक अन्य प्रमुख बीमारी है। यूनिकुला नेकेटर और एरीसिफे नेकेटर कवक कलियों, पत्तियों या टहनियों पर अपनी सर्दियां बीता सकते हैं, और वसंत की शुरुआत में संक्रमण शुरू कर सकते हैं। मध्यम सापेक्ष आर्द्रता के साथ उच्च तापमान से इस बीमारी को मदद मिलती है। रोगाणु की वजह से पौधे के हरे भागों पर पाउडरी विकास होने लगता है। इसके लक्षण पत्तियों के समूहों पर क्लोरोटिक के साथ शुरू होते हैं, जो प्लास्मोपारा विटिकोला की वजह से होने वाले धब्बों की तरह दिखाई देते हैं, लेकिन छोटे होते हैं। बाद में, एक सफेद पाउडरी पदार्थ दिखाई देता है। यह सफेद पाउडर तनों और फलों पर भी दिखाई देता है। फलों के लक्षणों में फटना, परिगलन और गिरना भी शामिल हैं। मामूली संक्रमण के मामलों में भी, इस रोग के कारण उत्पाद की गुणवत्ता और उपज में कमी हो सकती है, और पौधे की सर्दियां सहन करने की क्षमता कम हो सकती है।

बीमारी का नियंत्रण उचित निवारक उपायों के साथ शुरू होता है। इनमें उचित छंटाई, और भूमि पर पड़े मृत पौधे के ऊतकों को हटाने सहित जंगली घास पर नियंत्रण और पौधों के बीच सुरक्षित दूरी रखना शामिल है। फसल की सामान्य स्थिति (पोषक तत्व और जल स्तर, धूप, वायु संचार) भी उसकी प्रतिरक्षा क्षमता को बढ़ा सकती है। उचित प्रशिक्षण और छंटाई पाउडरी फफूंदी के नियंत्रण में बहुत महत्वपूर्ण हैं। उचित वायु संचार और सीधी धूप से बीमारी फैलने में देरी हो सकती है।

रासायनिक उपचार में सल्फ्यूरिक यौगिकों का प्रयोग शामिल है। कई उत्पादक 18-30 °C (64.4 – 86 °F) के बीच के तापमान में सल्फर का प्रयोग करते हैं। हालाँकि, कम तापमान में, सल्फर निष्क्रिय हो सकता है, और 30 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान में, यह फलों को रासायनिक रूप से जला सकता है। किसी भी मामले में, रासायनिक उपचार हमेशा स्थानीय लाइसेंस प्राप्त कृषि विज्ञानी की देखरेख में किया जाता है। हर बार पौधों को छूने पर उपकरण कीटाणुशोधन जैसे उचित स्वच्छता मानकों का प्रयोग करना भी महत्वपूर्ण है।

एस्का

एस्का लकड़ी की एक गंभीर बीमारी है जो विभिन्न कवकों के कारण होती है। यही कारण है कि इसे एस्का कॉम्प्लेक्स कहा जाता है। इस बीमारी के बारे में माना जाता था कि यह केवल दस साल या उससे ज्यादा पुराने परिपक्व पौधों को प्रभावित करती है। हालाँकि, अब यह माना जाता है कि यह नर्सरी में भी, छोटे पौधों को प्रभावित कर सकती है। ज्यादा छंटाई, सर्दियों में पाला, और लकड़ी की कोई भी चोट पौधों को कमजोर बना सकती है और रोग चक्र को तेज कर सकती है। एस्का को “मूक रोग” कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि इसके लक्षणों पर अक्सर किसी का ध्यान नहीं जाता, और कुछ मामलों में, यह पौधे की अचानक मृत्यु का कारण बन सकता है। यह इटली, फ्रांस और स्पेन में परिपक्व यूरोपीय अंगूर के खेतों की एक बड़ी समस्या बन गया है।

इसका सबसे सामान्य रोगाणु फोमिटिपोरिया मेडिटरेना है। पत्तियों पर, लक्षण फेमोमोनीला, फिओएक्रोमोनियम और सिलिंड्रोकार्पोन एसपीपी. से आने वाले विषाक्त पदार्थों के कारण दिखाई देते हैं। एस्का एक पुरानी बीमारी के रूप में दिखाई दे सकता है, या गर्म और शुष्क अवधि के दौरान अचानक एपोप्लेक्सी के माध्यम से सामने आ सकता है।

इसके लक्षणों में तने के क्रॉस-सेक्शनल कटाव में ऊतक का रंग उतरना शामिल होता है। लकड़ी कोमल और पीली भी हो सकती है। कुछ मामलों में, हमें पत्तियों पर विशेष बाघ जैसी धारियां भी दिखाई पड़ सकती हैं। अंगूर पर काले धब्बे भी दिखाई दे सकते हैं। संक्रमित प्रसारित सामग्री और हवा से यह रोग स्थानांतरित हो सकता है। रोग के नियंत्रण में मुख्य रूप से स्वस्थ प्रसार सामग्री का प्रयोग, छंटाई की गयी लकड़ियों के बड़े घाव का कीटाणुशोधन और रोगग्रस्त पौधों को हटाने और जलाने जैसे निवारक उपाय शामिल हैं।

ग्रे फफूंदी

ग्रे फफूंदी अंगूर की एक गंभीर बीमारी है, जो प्रसिद्ध कवक बोट्राइटिस सिनेरिया के कारण होती है। यह बीमारी मुख्य रूप से पके हुए अंगूरों को प्रभावित करती है, जिनकी कटाई का समय करीब होता है। हम मुख्य रूप से अंगूरों पर भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं, जो धीरे-धीरे पूरे फल को ढँक देते हैं। फल का रंग बदल जाता है, यह कोमल होकर सड़ जाता है और अंत में सूख जाता है। ये सूखे हुए अंगूर जमीन पर गिर जायेंगे, और अगर उन्हें वहीं छोड़ दिया जाता है तो ये बीमारी फैलाने के सबसे प्रभावशाली कारक हो सकते हैं। जल्द ही, संक्रमित फलों के संपर्क में आकर कई फलों के गुच्छे प्रभावित हो जाते हैं। कुछ दिनों में, सभी संक्रमित भाग एक विशेष ग्रे फफूंदी से ढँक जाते हैं। इस बीमारी के संक्रमण को तापमान की एक व्यापक श्रृंखला में उच्च आर्द्रता स्तरों का सहयोग मिलता है। हवा और बारिश से रोग के बीजाणु तेजी से एक पौधे से दूसरे पौधे पर जाते हैं।

इसके नियंत्रण के उपाय अन्य फफूंदी रोगों में प्रयोग किये जाने वाले उपायों के समान हैं। स्वच्छता बहुत महत्वपूर्ण है। संक्रमित पौधे के ऊतकों को तुरंत हटा देना जाना चाहिए, और उचित छंटाई अच्छे वायु संचार को बढ़ावा देगी, जिसकी वजह से रोग फैलने से रोका जा है।

हालाँकि, यह उल्लेख करना जरूरी है कि मौसम की विशेष स्थितियों में बोट्राइटिस की वजह से नोबल रॉट नामक एक अलग स्थिति उत्पन्न हो सकती है। उन परिस्थितियों में, फलों में शर्करा की मात्रा में 40% तक की असाधारण वृद्धि हो सकती है। संक्षेप में, पानी वाष्पित होने के कारण ऐसा होता है, जिससे शेष रस में शर्करा की मात्रा बढ़ जाती है। कई किसान इसका लाभ उठाकर, विशेष प्रकार की मीठी वाइनों का उत्पादन करते हैं। हालाँकि, इस तकनीक की सफलता के लिए विशेष प्रबंधन और कई सालों के अनुभव की जरूरत होती है।

काला अपक्षय

काला अपक्षय एक फफूंदी रोग है जो गुइगार्डिया बिडवे रोगाणु के कारण होता है।

गर्म और आर्द्र जलवायु से इस बीमारी के प्रसार में मदद मिलती है। यह बीमारी बेल के सभी हरे भागों को प्रभावित करती है, लेकिन सबसे गंभीर परिणाम फल पर दिखाई देते हैं। जैसा कि नाम से पता चलता है, इस बीमारी की वजह से संक्रमित अंगूर कोमल होकर सड़ जाते हैं, और अंत में सूख जाते हैं। ये सूखे हुए अंगूर जमीन पर गिर जायेंगे, और अगर उन्हें वहीं छोड़ दिया जाता है तो ये बीमारी फैलाने के सबसे प्रभावशाली कारक हो सकते हैं।

बीमारी का नियंत्रण उचित निवारक उपायों के साथ शुरू होता है। इनमें उचित छंटाई, और जमीन पर गिरे सूखे अंगूरों को हटाने सहित, जंगली घास का नियंत्रण और पौधों के बीच सुरक्षित दूरी रखना शामिल है। अच्छी धूप मिलने पर और अच्छे वायु संचार से बीमारी फैलने से रोका जा सकता है।

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