अंगूर की किस्मों

अंगूर की किस्मों का फैसला करना

अंगूर की किस्म का फैसला करना कोई आसान चीज नहीं है। चुनी जाने वाली उगाने की विधि, हमारे क्षेत्र में उगने वाली अंगूर की किस्मों पर विचार करना बहुत महत्वपूर्ण होता है और साथ ही आपको यह भी विचार करना पड़ता है कि हमारी चुनी गयी किस्म को अच्छे दाम पर बेचा जा सकता है या नहीं। अंगूर का खेत लगाने की दो विधियां हैं: ऑटोजेनस पौधे उगाना या ग्राफ्टेड कटिंग लगाना। किसी भी मामले में, प्रत्येक किस्म की अपनी विशेष गुणवत्ता विशेषताएं होती हैं, जो विशिष्ट जलवायु और मिट्टी की आवश्यकताओं के अंतर्गत जाहिर होती हैं, जैसे पीएच या ईसी स्तर, पानी और पोषण की आवश्यकताएं, तापमान या धूप। इसलिए आपका चुनाव और फैसला सावधानी और तथ्य पर आधारित होना चाहिए।

ऑटोजेनस अंगूर की बेल उगाना।

1850-60 के बाद से, ज्यादातर यूरोपीय अंगूर-उत्पादकों ने धीरे-धीरे ऑटोजेनस अंगूर के पौधे लगाने बंद कर दिए थे। ऐसा एक भयानक दुश्मन के आने के कारण हुआ था, जो उस समय यूरोप में अज्ञात था। इस दुश्मन को फिलॉक्सेरा (फिलॉक्सेरा वेस्टाट्रिक्स) के नाम से जाना जाता है और यह मिट्टी में पाया जाने वाला एफिड होता है जो बेलों के लिए बेहद हानिकारक होता है। ऐसा माना जाता है कि एफिड अमेरिका से आया था, और इस कीट के साथ लंबे समय तक रहने के कारण अमेरिकी अंगूर की बेलों ने पहले ही इसके लिए प्रतिरक्षा विकसित कर ली थी। उससे पहले, मुख्य फसल विटिस विनिफेरा प्रजातियों से संबंधित थी, जिनमें से ज्यादातर एफिड के प्रति संवेदनशील होते हैं। हालाँकि, जिन क्षेत्रों में फिलॉक्सेरा की समस्या सामने नहीं आई थी, वहां कुछ छोटे किसान अभी भी ऑटोजेनस पौधे लगाना पसंद करते हैं।

ग्राफ्टेड अंगूर की कटिंग उगाना।

जैसा कि हमने ऊपर बताया है, 1850 के दौरान, यूरोपीय उत्पादकों ने फिलॉक्सेरा के हमले के समाधान की तलाश शुरू की। इसका समाधान वहीं से आया जहाँ से हमला आया था, यानी अमेरिका से। अमेरिका की स्थानीय अंगूर की किस्मों ने लंबे समय तक इस कीट के साथ सहजीवन की वजह से इनके खिलाफ प्रतिरक्षा विकसित कर ली थी। इसलिए, उन्होंने अमेरिकी रूटस्टॉक पर अपनी पारंपरिक विटिस विनिफेरा की किस्मों को ग्राफ्ट करना शुरू किया। ग्राफ्टिंग आमतौर पर इस्तेमाल की जाने वाली एक तकनीक है जिसमें हम दो अलग-अलग पौधों के हिस्सों को एक साथ जोड़ देते हैं ताकि वे एक साथ एक ही पौधे के रूप में विकसित हो सकें। पहले पौधे के ऊपरी हिस्से को साइअन कहा जाता है जो दूसरे पौधे की जड़ प्रणाली पर बढ़ता है, जिसे रूटस्टॉक कहा जाता है। अंत में, हमारे पास एक पौधा होता है जो अपने विभिन्न घटकों के सभी लाभों को आपस में जोड़ता है।

मुख्य रूप से किसी विशेष मिट्टी और तापमान स्थितियों में अपनी सहनशीलता के आधार पर, पसंदीदा रूटस्टॉक बहुत सारे हैं। सबसे अधिक प्रयोग किये जाने वाले कुछ रूटस्टॉक निम्नलिखित प्रजातियों के होते हैं:

विटिस रिपेरिया (जैसे, रिपेरिया ग्लोरी डे मोंटपेलियर)

विटिस रुपेस्ट्रिस (जैसे रुपेस्ट्रिस दू लॉट)

रिपारिया-रुपेस्ट्रिस का संयोजन

बेर्लन्डिएरी x रिपेरिया समूह के रूटस्टॉक

बेर्लन्डिएरी x रिपेरिया समूह और कई अन्य के रूटस्टॉक

रूपात्मक विशेषताओं और उगाने की तकनीकों दोनों में प्रत्येक रूटस्टॉक काफी भिन्न होते हैं।

चाहे हम जो भी विधि चुनें, समस्याओं से बचने के लिए हमें वैध विक्रेता से ही पौधे खरीदने चाहिए।

अंगूर की किस्म चुनना

अंगूर की बेल की किस्में

हज़ारों सालों से अंगूर की खेती होने के कारण, हज़ारों किस्में विकसित हुई हैं। आमतौर पर, हम अंगूर की किस्मों को तीन प्रमुख समूहों में विभाजित करते हैं।

वाइन बनाने वाली किस्में:

वाइन उत्पादन के अपने लंबे इतिहास के कारण, इस श्रेणी में ज्यादातर यूरोपीय किस्मों को शामिल किया जाता है। हालाँकि, कुछ अमेरिकी किस्में भी महत्वपूर्ण हैं। आमतौर पर वाइन बनाने के लिए प्रयोग की जाने वाली अंगूर की कुछ किस्में हैं: कैबरनेट फ्रेंक, कैबरनेट सॉविनन, माल्बेक, मेरोट, पिनोट नोइर, सीराह, कॉनकॉर्ड (लाल किस्में), शारडोने, पिनोट ब्लैंक, पिनोट ग्रीस, सेमिलन, ग्यूवेर्स्ट्रामाइनर, कैटावबा, डेलावेयर (व्हाइट वाइन)

करंट उत्पादन वाली किस्में:

सबसे प्रसिद्ध किस्मों में सुल्तानिना और कोरिंथ शामिल हैं।

सीधे खाने के लिए प्रयोग की जाने वाली अंगूर की किस्में:

कार्डिनल, पेरीलेट, विक्टोरिया, रिबियर और अन्य।

आप अपनी चुनी गयी बेल की किस्म के बारे में टिप्पणी या तस्वीर डालकर इस लेख को ज्यादा बेहतर बना सकते हैं।

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